
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ सदुत्पादमनन्यत्वेन निश्चिनोति - द्रव्यं हि तावद्द्रव्यत्वभूतामन्वयशक्तिं नित्यमप्यपरित्यजद्भवति सदेव । यस्तु द्रव्यस्य पर्यायभूताया व्यतिरेकव्यक्ते: प्रादुर्भाव: तस्मिन्नपि द्रव्यत्वभूताया अन्वयशक्तेरप्रच्यवनात् द्रव्यमनन्यदेव । ततोऽनन्यत्वेन निश्चीयते द्रव्यस्य सदुत्पाद: । तथाहि - जीवो द्रव्यं भवन्नारकतिर्यग्मनुष्यदेवसिद्धत्वानामन्यतमेन पर्यायेण द्रव्यस्य पर्यायदुर्ललितवृत्तित्वादवश्यमेव भविष्यति । स हि भूत्वा च तेन किं द्रव्यत्वभूतामन्वयशक्ति-मुज्झति, नोज्झति । यदि नोज्झति कथमन्यो नाम स्यात्, येन प्रकटितत्रिकोटिसत्तक: स एव न स्यात् ॥११२॥ प्रथम तो द्रव्य द्रव्यत्वभूत अन्वयशक्ति को कभी भी न छोड़ता हुआ सत् (विद्यमान) ही है । और द्रव्य के जो पर्यायभूत व्यतिरेकव्यक्ति का उत्पाद होता है उसमें भी द्रव्यत्वभूत अन्वयशक्ति का अच्युतपना होने से द्रव्य अनन्य ही है, (अर्थात् उस उत्पाद में भी अन्वयशक्ति तो अपतित- अविनष्ट-निश्चल होने से द्रव्य वह का वही है, अन्य नहीं ।) इसलिये अनन्यपने के द्वारा द्रव्य का सत्-उत्पाद निश्चित होता है, (अर्थात् उपरोक्त कथनानुसार द्रव्य का द्रव्यापेक्षा से अनन्यपना होने से, उसके सत्-उत्पाद है,—ऐसा अनन्यपने द्वारा सिद्ध होता है ।) इसी बात को (उदाहरण से) स्पष्ट किया जाता है :— जीव द्रव्य होने से और द्रव्य पर्यायों में वर्तने से जीव नारकत्व, तिर्यंचत्व, मनुष्यत्व, देवत्व और सिद्धत्व में से किसी एक पर्याय में अवश्यमेव (परिणमित) होगा । परन्तु वह जीव उस पर्यायरूप होकर क्या द्रव्यत्वभूत अन्वयशक्ति को छोड़ता है ? नहीं छोड़ता । यदि नहीं छोड़ता तो वह अन्य कैसे हो सकता है कि जिससे त्रिकोटि सत्ता (तीन प्रकार की सत्ता, त्रैकालिक अस्तित्व) जिसके प्रगट है ऐसा वह (जीव), वही न हो? ॥११२॥ |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ पूर्वोक्तमेव सदुत्पादंद्रव्यादभिन्नत्वेन विवृणोति-- जीवो जीवः कर्ता भवं भवन् परिणमन् सन् भविस्सदि भविष्यति तावत् । किं किं भविष्यति । निर्विकारशुद्धोपयोगविलक्षणाभ्यां शुभाशुभोपयोगाभ्यां परिणम्य णरोऽमरो वा परो नरो देवः परस्तिर्यङ्नारकरूपो वा निर्विकारशुद्धोपयोगेन सिद्धो वा भविष्यति । भवीय पुणो एवंपूर्वोक्तप्रकारेण पुनर्भूत्वापि । अथवा द्वितीयव्याख्यानम् । भवन् वर्तमानकालापेक्षया भविष्यतिभाविकालापेक्षया भूत्वा भूतकालापेक्षया चेति कालत्रये चैवं भूत्वापि किं दव्वत्तं पजहदि किं द्रव्यत्वंपरित्यजति । ण चयदि द्रव्यार्थिकनयेन द्रव्यत्वं न त्यजति, द्रव्याद्भिन्नो न भवति । अण्णो कहं हवदि अन्यो भिन्नः कथं भवति । किंतु द्रव्यान्वयशक्तिरूपेण सद्भावनिबद्धोत्पादः स एवेति द्रव्यादभिन्न इतिभावार्थः ॥११२॥ [जीवो] जीवरूपी कर्ता (कर्ताकारक में प्रयुक्त जीव) [भवं] परिणमित होता हुआ [भविस्सदि] होगा । परिणमित होता हुआ जीव क्या-क्या होगा? विकार रहित शुद्धोपयोग से विलक्षण शुभाशुभ उपयोगरूप से परिणमन कर [णरोऽमरो वा परो] मनुष्य, देव और अन्य तिर्यंच, नारकी रूप अथवा पूर्ण विकार रहित शुद्धोपयोग से सिद्ध होगा । [भवीय पुणो] इसप्रकार पहले कहे हुये मनुष्यादि रूप होकर भी । अथवा दूसरा व्याख्यान -
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