+ अब, मूर्त पुद्‌गल द्रव्य के गुण कहते हैं -
वण्णरसगंधफासा विज्जंते पुग्गलस्स सुहुमादो । (132)
पुढवीपरियंतस्स य सद्दो सो पोग्गलो चित्तो ॥142॥
वर्णरसगंधस्पर्शा विद्यन्ते पुद्गलस्य सूक्ष्मात् ।
पृथिवीपर्यन्तस्य च शब्दः स पुद्गलश्चित्रः ॥१३२॥
सूक्ष्म से पृथ्वी तलक सब पुद्गलों में जो रहें
स्पर्श रस गंध वर्ण गुण अर शब्द सब पर्याय हैं ॥१४२॥
अन्वयार्थ : सूक्ष्म से लेकर पृथ्वी पर्यन्त सर्व पुद्गल के वर्ण, रस, गन्ध और स्पर्श विद्यमान हैं; तथा जो शब्द है,वह पुद्गल की विविध प्रकार की पर्याय है ।
Meaning : The substance (dravya) of matter (pudgala), from the minute atom (paramānau) to the gross earth (prithivī), have the qualities of colour (varnaa), taste (rasa), smell (gandha) and touch (sparsha). The sound (shabda), which is of many kinds, is the mode (paryāya) of the matter (pudgala).

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ मूर्तस्य पुद्‌गलद्रव्यस्य गुणान्‌ गृणाति -

इन्द्रियग्राह्या: किल स्पर्शरसगन्धवर्णास्तद्विषयत्वात्‌, ते चेन्द्रियग्राह्यत्वव्यक्तिशक्तिवशात्‌ गृह्यमाणा अगृह्यमाणाश्च आ-एकद्रव्यात्मकसूक्ष्मपर्यायात्परमाणो: आ-अनेकद्रव्या-त्मकस्थूलपर्यायात्पृथिवीस्कन्धाच्च सकलस्यापि पुद्‌गलस्याविशेषेण विशेषगुणत्वेन विद्यन्ते । ते च मूर्तत्वादेव शेषद्रव्याणामसंभवन्त:, पुद्‌गलमधिगमयन्ति ।
शब्दस्यापीन्द्रियग्राह्यत्वाद्‌गुणत्वं न खल्वाशङ्कनीयं, तस्य वैचित्र्यप्रपञ्चितवैश्वरूप-स्याप्यनेकद्रव्यात्मकपुद्‌गलपर्यायत्वेनाभ्युपगम्यमानत्वात्‌ ।
गुणत्वे वा, न तावदमूर्तद्रव्यगुण: शब्द: गुणगुणिनोरविभक्तिप्रदेशत्वेनैकवेदनवेद्य-त्वादमूर्तद्रव्यस्यापि श्रवणेन्द्रियविषयत्वापत्ते: । पर्यायलक्षणेनोत्खातगुणलक्षणत्वान्मूर्त-द्रव्यगुणोऽपि न भवति । पर्यायलक्षणं हि कादाचित्कत्वं गुणलक्षणं तु नित्यत्वम्‌ । तत: कादाचित्कत्वोत्खातनित्यत्वस्य न शब्दस्यास्ति गुणत्वम्‌ । यत्तु तत्र नित्यत्वं तत्तदारम्भक-पुद्‌गलानां तद्‌गुणानां च स्पर्शादीनामेव, न शब्दपर्यायस्येति दृढतरं ग्राह्यम्‌ ।

न च पुद्‌गलपर्यायेत्वे शब्दस्य पृथिवीस्कन्धस्येव स्पर्शनादीन्द्रियविषयत्वम्‌, अपां घ्राणे-न्द्रियाविषयत्वात्‌, ज्योतिषो घ्राणरसनेन्द्रियाविषयत्वात्‌, मरुतो घ्राणरसनचक्षुरिन्द्रियाविषय-त्वाच्च । न चागन्धागन्धरसागन्धरसवर्णा:, एवमप्‌ज्योतिर्मारुत:, सर्वपुद्‌गलानां स्पर्शादि- चतुष्कोपेतत्वाभ्युगमात, व्यक्तस्पर्शादिचतुष्कानां च चन्द्रकान्तारणियवानामारम्भकैरेव पुद्‌गलैरव्यक्तगन्धाव्यक्तगन्धरसाव्यक्तगन्धरसवर्णानामपूज्योतिरुदरमरुतामारम्भदर्शनात्‌ ।
न च क्वचित्कस्यचित्‌ गुणस्य व्यक्ताव्यक्तत्वं कादाचित्कपरिणामवैचित्र्यप्रत्ययं नित्य-द्रव्यस्वभावप्रतिघाताय । ततोऽस्तु शब्द: पुद्‌गलपर्याय एवेति ॥१३२॥



स्पर्श, रस, गंध और वर्ण इन्द्रियग्राह्य हैं, क्योंकि वे इन्द्रियों के विषय हैं । वे इन्द्रियग्राह्यता की व्यक्ति और शक्ति के वश से भले ही इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण किये जाते हों या न किये जाते हों तथापि वे एकद्रव्यात्मक सूक्ष्मपर्यायरूप परमाणु से लेकर अनेकद्रव्यात्मक स्थूलपर्यायरूप पृथ्वीस्कंध तक के समस्त पुद्‌गल के, अविशेषतया विशेष गुणों के रूप में होते हैं; और उनके मूर्त होने के कारण ही, (पुद्‌गल के अतिरिक्त) शेष द्रव्यों के न होने से वे पुद्‌गल को बतलाते हैं ।

ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये कि शब्द भी इन्द्रियग्राह्य होने से गुण होगा; क्योंकि वह (शब्द) विचित्रता के द्वारा विश्वरूपपना (अनेकानेकप्रकारत्‍व) दिखलाता है, फिर भी उसे अनेकद्रव्यात्मक पुद्‌गलपर्याय के रूप में स्वीकार किया जाता है ।

यदि शब्द को (पर्याय न मानकर) गुण माना जाये तो वह क्यों योग्य नहीं है उसका समाधान:—

प्रथम तो, शब्द अमूर्त द्रव्य का गुण नहीं है क्योंकि गुण-गुणी में अभिन्न प्रदेशपना होने से वे (गुण-गुणी) 1एक वेदन से वेद्य होने से अमूर्त द्रव्य को भी श्रवणेन्द्रिय का विषयभूतपना आ जायेगा ।

(दूसरे, शब्द में) पर्याय के लक्षण द्वारा गुण का लक्षण उत्थापित होने से शब्द मूर्त द्रव्य का गुण भी नहीं है । पर्याय का लक्षण कादाचित्कपना (अनित्यपना) है, और गुण का लक्षण नित्यपना है; इसलिये (शब्द में) अनित्यपने से नित्यपने के उत्थापित होने से (अर्थात् शब्द कभी-कभी ही होता है, और नित्य नहीं है, इसलिये) शब्द वह गुण नहीं है । जो वहाँ नित्यपना है वह उसे (शब्द को) उत्पन्न करने वाले पुद्‌गलों का और उनके स्पर्शादिक गुणों का ही है, शब्दपर्याय का नहीं,—इस प्रकार अति दृढ़तापूर्वक ग्रहण करना चाहिये ।

और, 'यदि शब्‍द पुद्‌गल की पर्याय हो तो वह पृथ्वी स्‍कंध की भांति स्‍पर्शनादिक इन्द्रियों का विषय होना चाहिये, अर्थात् जैसे पृथ्‍वीस्‍कंधरूप पुद्‌गलपर्याय सर्व इन्द्रियों से ज्ञात होती है उसी प्रकार शब्दरूप पुद्‌गलपर्याय भी सभी इन्द्रियों से ज्ञात होनी चाहिये' (ऐसा तर्क किया जाये तो) ऐसा भी नहीं है; क्योंकि
  • पानी (पुद्‌गल की पर्याय है, फिर भी) घ्राणेन्द्रिय का विषय नहीं है;
  • अग्नि घ्राणेन्द्रिय तथा रसनेन्द्रिय का विषय नहीं है और
  • वायु घ्राण, रसना तथा चक्षुइन्द्रिय का विषय नहीं है ।
और ऐसा भी नहीं है कि --
  • पानी गंध रहित है (इसलिये नाक से अग्राह्य है),
  • अग्नि गंध तथा रस रहित है (इसलिये नाक, जीभ से अग्राह्य है) और
  • वायु गंध, रस तथा वर्ण रहित है (इसलिये नाक, जीभ तथा आँखों से अग्राह्य है);
क्योंकि सभी पुद्‌गल स्पर्शादि 2चतुष्कयुक्त स्वीकार किये गये हैं क्योंकि जिनके स्पर्शादि चतुष्क व्यक्त हैं ऐसे
  • चन्द्रकांत-मणि को,
  • अरणि को और
  • जौ को
जो पुद्‌गल उत्पन्न करते हैं उन्हीं के द्वारा
  • जिसकी गंध अव्यक्त है ऐसे पानी की,
  • जिसकी गंध तथा रस अव्यक्त है ऐसी अग्नि की और
  • जिसकी गंध, रस तथा वर्ण अव्यक्त है ऐसी उदरवायु की
उत्पत्ति होती देखी जाती है ।

और कहीं (किसी पर्याय में) किसी गुण की कादाचित्क परिणाम की विचित्रता के कारण होने वाली व्यक्तता या अव्यक्तता नित्य द्रव्यस्वभाव का प्रतिघात नहीं करता । (अर्थात् अनित्यपरिणाम के कारण होने वाली गुण की प्रगटता और अप्रगटता नित्य द्रव्यस्वभाव के साथ कहीं विरोध को प्राप्त नहीं होती ।)

इसलिये शब्द पुद्‌गल की पर्याय ही है ॥१३२॥


1एक वेदन से वेद्य = एक ज्ञान से ज्ञात होने योग्य (नैयायिक शब्द को आकाश का गुण मानते हैं किन्तु यह मान्यता अप्रमाण है । गुण-गुणी के प्रदेश अभिन्न होते हैं, इसलिये जिस इन्द्रिय से गुण ज्ञात होता है उसी से गुणी भी ज्ञात होना चाहिए । शब्द कर्णेन्द्रिय से जाना जाता है, इसलिये आकाश भी कर्णेन्द्रिय से ज्ञात होना चाहिये । किन्तु वह तो किसी भी इन्द्रिय से ज्ञात होता नहीं है । इसलिये शब्द आकाशादि अमूर्तिक द्रव्यों का गुण नहीं है ।)
2चतुष्क = चतुष्टय, चार का समूह । (समस्त पुद्गलों में - पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु इन सब ही में स्पर्शादि चारों गुण होते हैं । मात्र अन्तर इतना ही हैं कि पृथ्वी में चारों गुण व्यक्त हैं, पानी में गंध अव्यक्त है, अग्नि में गंध तथा रस अव्यक्त है, और वायु में गंध, रस, तथा वर्ण अव्यक्त हैं । इस बात की सिद्धि के लिये युक्ति इसप्रकार है :- चन्द्रकान्तमणिरूप पृथ्वी में से पानी झरता है; अरणि की -लकड़ी में से अग्नि प्रगट होती है और जौ खाने से पेट में वायु उत्पन्न होती है; इसलिये (१) चन्द्रकांतमणिमें, (२) अरणि -लकड़ी में और (३) जौ में रहनेवाले चारों गुण (१) पानी में, (२) अग्नि में और (३) वायु में होने चाहिये । मात्र अन्तर इतना ही है कि उन गुणों में से कुछ अप्रगटरूप से परिणमित हुये हैं । और फिर, पानी में से मोतीरूप पृथ्वीकाय अथवा अग्नि में से काजलरूप पृथ्वीकाय के उत्पन्न होने पर चारों गुण प्रगट होते हुये देखे जाते हैं ।)
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ मूर्तपुद्गलद्रव्यस्य गुणानावेदयति --
वण्णरसगंधफासा विज्जंते पोग्गलस्स वर्णरसगन्धस्पर्शा विद्यन्ते । कस्य । पुद्गलस्य । कथंभूतस्य । सुहुमादो पुढवीपरियंतस्स य
पुढवी जलंच छाया चउरिंदियविसयकम्मपरमाणू ।
छव्विहभेयं भणियं पोग्गलदव्वं जिणवरेहिं ॥

इति गाथाकथितक्रमेण परमाणुलक्षणसूक्ष्मस्वरूपादेः पृथ्वीस्कन्धलक्षणस्थूलस्वरूपपर्यन्तस्य च । तथाहि —यथानन्तज्ञानादिचतुष्टयं विशेषलक्षणभूतं यथासंभवं सर्वजीवेषु साधारणं तथा वर्णादिचतुष्टयं विशेष-लक्षणभूतं यथासंभवं सर्वपुद्गलेषु साधारणम् । यथैव चानन्तज्ञानादिचतुष्टयं मुक्तजीवेऽतीन्द्रियज्ञान-विषयमनुमानगम्यमागमगम्यं च, तथा शुद्धपरमाणुद्रव्ये वर्णादिचतुष्टयमप्यतीन्द्रियज्ञानविषयमनुमान-गम्यमागमगम्यं च । यथा वानन्तचतुष्टयस्य संसारिजीवे रागादिस्नेहनिमित्तेन कर्मबन्धवशादशुद्धत्वंभवति तथा वर्णादिचतुष्टयस्यापि स्निग्धरूक्षगुणनिमित्तेन द्वि-अणुकादिबन्धावस्थायामशुद्धत्वम् । यथावानन्तज्ञानादिचतुष्टयस्य रागादिस्नेहरहितशुद्धात्मध्यानेन शुद्धत्वं भवति तथा वर्णादिचतुष्टयस्यापि स्निग्धगुणाभावे बन्धनेऽसति परमाणुपुद्गलावस्थायां शुद्धत्वमिति । सद्दो सो पोग्गलो यस्तु शब्दः स पौद्गलः । यथा जीवस्य नरनारकादिविभावपर्यायाः तथायं शब्दः पुद्गलस्य विभावपर्यायो, न चगुणः । कस्मात् । गुणस्याविनश्वरत्वात्, अयं च विनश्वरो । नैयायिकमतानुसारी कश्चिद्वदत्याकाश-गुणोऽयं शब्दः । परिहारमाह – आकाशगुणत्वे सत्यमूर्तो भवति । अमूर्तश्च श्रवणेन्द्रियविषयो नभवति, दृश्यते च श्रवणेन्द्रियविषयत्वम् । शेषेन्द्रियविषयः कस्मान्न भवतीति चेत् — अन्येन्द्रियविषयोऽन्येन्द्रियस्य न भवति वस्तुस्वभावादेव, रसादिविषयवत् । पुनरपि कतंभूतः । चित्तोचित्रः भाषात्मकाभाषात्मकरूपेण प्रायोगिकवैश्रसिकरूपेण च नानाप्रकारः । तच्च सद्दो खंधप्पभवो इत्यादिगाथायां पञ्चास्तिकाये व्याख्यातं तिष्ठत्यत्रालं प्रसङ्गेन ॥१४२॥


[वण्णरसगंधफासा विज्जंते पोग्गलस्स] वर्ण, रस, गंध, स्पर्श विद्यमान हैं । ये किसके विद्यमान हैं? ये पुद्गल के विद्यमान हैं । ये कैसे पुद्गल के विद्यमान हैं? [सुहुमादो पुढवीपरियंतस्स य] ''पुद्गल द्रव्य को जिनेन्द्रदेव ने पृथ्वी, जल, छाया (नेत्र को छोड़कर) चार इन्द्रियों के विषय, कर्म और परमाणु- इसप्रकार छह भेद वाला कहा है ।'' इस गाथा में कहे हुये क्रम से परमाणु लक्षण सूक्ष्म स्वरूप से पृथ्वी स्कन्ध लक्षण स्थूल स्वरूप वाले पुद्गल के विद्यमान है |

वह इसप्रकार- जैसे विशेषणभूत अनन्तज्ञानादि चतुष्टय यथासंभव सभी जीवों में साधारण हैं उसी-प्रकार विशेष लक्षणभूत वर्णादि चतुष्टय यथासंभव सभी पुद्गलों में साधारण हैं । और जैसे मुक्त जीव में अनन्तज्ञानादि चतुष्टय, अतीन्द्रिय-ज्ञान के विषय तथा अनुमानगम्य और आगमगम्य हैं उसीप्रकार शुद्ध परमाणु द्रव्य में वर्णादि चतुष्टय भी अतीन्द्रिय-ज्ञान के विषय तथा अनुमानगम्य और आगमगम्य हैं । जैसे संसारी जीव में रागादि स्नेह (स्निग्ध-चिकनाई) के निमित्त से, कर्मबन्ध के वश अनन्त चतुष्टय के अशुद्धता होती है, उसीप्रकार वर्णादि चतुष्टय के भी द्वयणुक आदि बंध की अवस्था में स्निग्ध-रूक्ष गुण के निमित्त से अशुद्धता होती है । तथा जैसे रागादि स्नेह रहित शुद्धात्मा के ध्यान से अनन्त ज्ञानादि चतुष्टय के शुद्धता होती है, उसी प्रकार (बँधने योग्य) स्निग्ध गुण के अभाव में बन्धन नहीं होने पर, पुद्गल की परमाणु अवस्था में वर्णादि चतुष्टय के भी शुद्धता होती है । [सद्दो सो पोग्गलो] और जो शब्द है, वह पुद्गल है । जैसे जीव की मनुष्य नारक आदि विभाव पर्यायें हैं; उसीप्रकार यह शब्द पुद्गल की विभाव पर्याय है, गुण नहीं है । वह क्यों नहीं है? गुणों के अविनश्वरता-नित्यता-नष्ट नहीं होने से शब्द गुण नहीं है, यह नश्वर है-नष्ट होता है ।

नैयायिक मत का अनुसरण करने वाला कोई कहता है- यह शब्द आकाश का गुण है । आचार्य उसका निराकरण करते हैं- आकाश का गुण होने पर वह अमूर्त (सिद्ध) होता है । और अमूर्त कर्णेन्द्रिय का विषय नहीं होता, परन्तु उसके कर्णेन्द्रिय की विषयता देखी जाती है ।

प्रश्न – वह शेष इन्द्रियों का विषय किस कारण-क्यों नहीं होता है ?

उत्तर –
वस्तु के स्वभाव से ही रसादि विषयों के समान, किसी अन्य इन्द्रिय का विषय दूसरी अन्य इन्द्रिय का विषय नहीं होता है ।

वह शब्द भी कैसा है? [चित्तो] विविधप्रकार का- भाषात्मक, अभाषात्मक रूप से, कृत्रिम तथा स्वाभाविक रूप से अनेक प्रकार का है । और वह "शब्द स्कन्ध से उत्पन्न है- '' इत्यादि गाथा में 'पंचास्तिकाय' में कहा गया है; इसप्रकार यहाँ इस अतिप्रसंग से बस हो ॥१४२॥