+ अब, शेष अमूर्त द्रव्यों के गुण कहते हैं और द्रव्‍य का प्रदेशवत्‍व और अप्रदेशवत्‍वरूप विशेष (भेद) बतलाते हैं -
आगासस्सवगाहो धम्मद्दव्वस्स गमणहेदुत्तं । (133)
धम्मेदरदव्वस्स दु गुणो पुणो ठाणकारणदा ॥143॥
कालस्स वट्टणा से गुणोवओगो त्ति अप्पणो भणिदो । (134)
णेया संखेवादो गुणा हि मुत्तिप्पहीणाणं ॥144॥
आकाशस्यावगाहो धर्मद्रव्यस्य गमनहेतुत्वम् ।
धर्मेतरद्रव्यस्य तु गुणः पुनः स्थानकारणता ॥१३३॥
कालस्य वर्तना स्यात् गुण उपयोग इति आत्मनो भणितः ।
ज्ञेयाः संक्षेपाद्गुणा हि मूर्तिप्रहीणानाम् ॥१३४॥
आकाश का अवगाह धर्माधर्म के गमनागमन
स्थानकारणता कहे ये सभी जिनवरदेव ने ॥१४३॥
उपयोग आतमराम का अर वर्तना गुण काल का
है अमूर्त द्रव्यों के गुणों का कथन यह संक्षेप में ॥१४४॥ युगलम् ॥
अन्वयार्थ : आकाश का अवगाह, धर्म द्रव्य का गमनहेतुत्व, अधर्म द्रव्य का स्थिति हेतुत्व, काल का गुण वर्तना और आत्मा का गुण उपयोग कहा गया है; इसप्रकार संक्षेप से अमूर्तद्रव्यों के गुण जानना चाहिये ।
Meaning : The specific quality of the substance of space (ākāsha dravya) is to provide room - avagāhana - to all substances at the same time. And, the specific quality of the substance of medium of motion (dharma dravya) is to render assistance in motion - gatihetutva - to the substances of soul (jīva) and matter (pudgala). Further, the specific quality of the substance of medium of rest (adharma dravya) is to render assistance in rest - sthitihetutva - to the substances of soul (jīva) and matter (pudgala). The specific quality of the substance of time (kāla dravya) is to render assistance to all substances in their continuity of being through gradual changes - vartanā - and in their modifications through time. Lord Jina has said that the specific quality of the substance of soul (jīva dravya) is consciousness (chetanā) that manifests in form of cognition (upayoga). In essence, each of the five noncorporeal (amūrtīka) substances (dravya) must be known to have the above mentioned specific qualities.

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथामूर्तानां शेषद्रव्याणां गुणान्‌ गृणाति -

विशेषगुणो हि युगपत्सर्वद्रव्याणां साधारणावगाहहेतुत्वमाकाशस्य, सकृत्सर्वेषां गमन-परिणामिनां जीवपुद्‌गलानां गमनहेतुत्वं धर्मस्य, सकृत्सर्वेषां स्थानपरिणामिनां जीव-पुद्‌गलानां स्थानहेतुत्वमधर्मस्य, अशेषशेषद्रव्याणां प्रतिपर्यायं समयवृत्तिहेतुत्वं कालस्य, चैतन्यपरिणामो जीवस्य । एवममूर्तानां विशेषगुणसंक्षेपाधिगमे लिङ्गम्‌ ।
तत्रैककालमेव सकलद्रव्यसाधारणावगाहसंपादनमसर्वगतत्वादेव शेषद्रव्याणाम-संभवदाकाशमधिगमयति । तथैकवारमेव गतिपरिणतसमस्तजीवपुद्‌गलानामालोकद्‌गमन-हेतुत्वमप्रदेशत्वात्कालपुद्‌गलयो:, समुद्‌घातादन्यत्र लोकासंख्येयभागमात्रत्वाज्जीवस्य । लोकालोकसीम्नोऽचलितत्वादाकाशस्य, विरुद्धकार्यहेतुत्वादधर्मस्यासंभवद्धर्ममधिगमयति ।
तथैकवारमेव स्थितिपरिणतसमस्तजीवपुद्‌गलानामालोकात्स्थानहेतुत्वमप्रदेशत्वा-त्कालपुद्‌गलयो:, समुद्‌घातादन्यत्र लोकासंख्येयभागमात्रत्वाज्जीवस्य लोकालोकसीम्नो-ऽचलितत्वादाकाशस्य, विरुद्धकार्यहेतुत्वाद्धर्मस्य चासंभवदधर्ममधिगमयति ।
तथा अशेषशेषद्रव्याणां प्रतिपर्यायं समयवृत्तिहेतुत्वं कारणान्तरसाध्यत्वात्समयविशिष्टाया वृत्ते: स्वतस्तेषामसंभवत्कालमधिगमयति ।
तथाचैतन्यपरिणामश्चेतनत्वादेव शेषद्रव्याणामसंभवन्‌ जीवमधिगमयति ।
एवं गुणविशेषाद्‌द्रव्यविशेषोऽधिगन्तव्य: ॥१३३-१३४ ॥





  • युगपत् सर्वद्रव्यों के साधारण अवगाह का हेतुपना आकाश का विशेष गुण है ।
  • एक ही साथ सर्व गमन-परिणामी (गतिरूप परिणमित) जीव-पुद्‌गलों के गमन का हेतुपना धर्म का विशेष गुण है ।
  • एक ही साथ सर्व स्थान-परिणामी (स्थितिरूप परिणमित) जीव-पुद्‌गलों के स्थिर होने का हेतुत्व स्थिति का (स्थिर होने का निमित्तपना) अधर्म का विशेषगुण है ।
  • (काल के अतिरिक्त) शेष समस्त द्रव्यों की प्रति-पर्याय में समयवृत्ति का हेतुपना ( समय-समय की परिणति का निमित्तत्व) काल का विशेष गुण है ।
  • चैतन्य-परिणाम जीव का विशेष गुण है ।
इस प्रकार अमूर्त-द्रव्यों के विशेष-गुणों का संक्षिप्त ज्ञान होने पर अमूर्त-द्रव्यों को जानने के लिंग (चिह्न, लक्षण, साधन) प्राप्त होते हैं; अर्थात् उन-उन विशेष गुणों के द्वारा उन-उन अमूर्त द्रव्यों का अस्तित्व ज्ञात (सिद्ध) होता है । (इसी को स्पष्टतापूर्वक समझाते हैं :—)

वहाँ एक ही काल में समस्त द्रव्यों को साधारण अवगाह का संपादन (अवगाह हेतुपनेरूप लिंग) आकाश को बतलाता है; क्योंकि शेष द्रव्यों के सर्वगत (सर्वव्यापक) न होने से उनके वह संभव नहीं है ।

इसी प्रकार एक ही काल में गतिपरिणत (गतिरूप से परिणमित हुए) समस्त जीव-पुद्‌गलों को लोक तक गमन का हेतुपना धर्म को बतलाता है; क्योंकि
  • काल और पुद्‌गल अप्रदेशी हैं इसलिये उनके वह संभव नहीं है;
  • जीव समुद्‌घात को छोड़कर अन्यत्र लोक के असंख्यातवें भाग मात्र है, इसलिये उसके वह संभव नहीं है,
  • लोक-अलोक की सीमा अचलित होने से आकाश को वह संभव नहीं है और
  • विरुद्ध कार्य का हेतु होने से अधर्म को वह संभव नहीं है ।


(काल और पुद्‌गल एकप्रदेशी हैं, इसलिये वे लोक तक गमन में निमित्त नहीं हो सकते; जीव समुद्घात को छोड़कर अन्य काल में लोक के असंख्यातवें भाग में ही रहता है, इसलिये वह भी लोक तक गमन में निमित्त नहीं हो सकता; यदि आकाश गति में निमित्त हो तो जीव और पुद्‌गलों की गति अलोक में भी होने लगे, जिससे लोकाकाश की मर्यादा ही न रहेगी; इसलिये गतिहेतुत्व आकाश का भी गुण नहीं है; अधर्म द्रव्य तो गति से विरुद्ध स्थितिकार्य में निमित्तभूत है, इसलिये वह भी गति में निमित्त नहीं हो सकता । इस प्रकार गतिहेतुत्वगुण धर्मनामक द्रव्य का अस्तित्व बतलाता है ।)

इसी प्रकार एक ही काल में स्थितिपरिणत समस्त जीव-पुद्‌गलों को लोक तक स्थिति का हेतुपना अधर्म को बतलाता है; क्योंकि
  • काल और पुद्‌गल अप्रदेशी होने से उनके वह संभव नहीं है;
  • जीव समुद्‌घात को छोड़कर अन्यत्र लोक के असंख्यातवें भाग मात्र है, इसलिये उसके वह संभव नहीं है;
  • लोक और अलोक की सीमा अचलित होने से आकाश के वह संभव नहीं है, और
  • विरुद्ध कार्य का हेतु होने से धर्म को वह संभव नहीं है ।


इसी प्रकार (काल के अतिरिक्त) शेष समस्त द्रव्यों के प्रत्येक पर्याय में समयवृत्ति का हेतुपना काल को बतलाता है, क्योंकि उनके, समय-विशिष्ट वृत्ति कारणान्तर से सधती होने से (उनके समय से विशिष्ट ऐसी परिणति अन्य कारण से होती है, इसलिये) स्वत: उनके वह (समयवृत्ति हेतुपना) संभवित नहीं है ।

इसी प्रकार चैतन्य-परिणाम जीव को बतलाता है, क्योंकि वह चेतन होने से शेष द्रव्यों के संभव नहीं है ।

इस प्रकार गुण-विशेष से द्रव्य-विशेष जानना चाहिये ॥१३३-१३४॥
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथाकाशाद्यमूर्तद्रव्याणांविशेषगुणान्प्रतिपादयति --
आगासस्सवगाहो आकाशस्यावगाहहेतुत्वं, धम्मद्दव्वस्स गमणहेदुत्तं धर्मद्रव्यस्यगमनहेतुत्वं, धम्मेदरदव्वस्स दु गुणो पुणो ठाणकारणदा धर्मेतरद्रव्यस्य तु पुनः स्थानकारणतागुणो भवतीतिप्रथमगाथा गता । कालस्स वट्टणा से कालस्य वर्तना स्याद्गुणः, गुणोवओगो त्ति अप्पणो भणिदो ज्ञानदर्शनोपयोगद्वयमित्यात्मनो गुणो भणितः । णेया संखेवादो गुणा हि मुत्तिप्पहीणाणं एवंसंक्षेपादमूर्तद्रव्याणां गुणा ज्ञेया इति । तथाहि --
सर्वद्रव्याणां साधारणमवगाहहेतुत्वं विशेषगुणत्वादेवान्यद्रव्याणामसंभवत्सदाकाशं निश्चिनोति । गतिपरिणतसमस्तजीवपुद्गलानामेकसमयेसाधारणं गमनहेतुत्वं विशेषगुणत्वादेवान्यद्रव्याणामसंभवत्सद्धर्मद्रव्यं निश्चिनोति । तथैव च स्थिति-परिणतसमस्तजीवपुद्गलानामेकसमये साधारणं स्थितिहेतुत्वं विशेषगुणत्वादेवान्यद्रव्याणामसंभवत्सद-धर्मद्रव्यं निश्चिनोति । सर्वद्रव्याणां युगपत्पर्यायपरिणतिहेतुत्वं विशेषगुणत्वादेवान्यद्रव्याणामसंभवत्स-त्कालद्रव्यं निश्चिनोति । सर्वजीवसाधारणं सकलविमलकेवलज्ञानदर्शनद्वयं विशेषगुणत्वादेवान्या-चेतनपञ्चद्रव्याणामसंभवत्सच्छुद्धबुद्धैकस्वभावं परमात्मद्रव्यं निश्चिनोति । अयमत्रार्थः — यद्यपि पञ्च-द्रव्याणि जीवस्योपकारं कुर्वन्ति तथापि तानि दुःखकारणान्येवेति ज्ञात्वाक्षयानन्तसुखादिकारणं विशुद्धज्ञानदर्शनोपयोगस्वभावं परमात्मद्रव्यं तदेव मनसा ध्येयं वचसा वक्तव्यं कायेन तत्साधकमनुष्ठानं च कर्तव्यमिति ॥१४३-१३४॥
एवं कस्य द्रव्यस्य के विशेषगुणा भवन्तीति कथनरूपेण तृतीयस्थले गाथात्रयं गतम् ।


[आगासस्सवगाहो] आकाश का अवगाहहेतुता (जगह देने में निमित्त होना) [धम्म-दव्वस्स गमणहेदुत्तं] धर्म द्रव्य का गमनहेतुता (चलने में निमित्त होना) [धम्मेदरदव्वस्स दु गुणो पुणोठाणकारणदा] और धर्मेतर द्रव्य का- अधर्म द्रव्य का स्थानकारणता (ठहरने में निमित्त होना) गुण है- इसप्रकार पहली (१४३ वी) गाथा पूर्ण हुई ।

[कालस्स वट्टणा से] काल का वर्तना गुण है । [गुणोवओगो त्ति अप्पणो भणिदो] ज्ञान-दर्शन दोनों उपयोग आत्मा के गुण कहे गये हैं । [णेया संखेवादो गुणा हि मुत्तिप्पहीणाणं] इसप्रकार संक्षेप से अमूर्त द्रव्यों के गुण जानना चाहिये ।

वह इसप्रकार-
  • अन्य द्रव्यों के असम्भव-नहीं पाये जाने वाले सभी द्रव्यों को साधारण-समान रूप से, अवगाह-हेतुत्वरूप विशेषगुण से ही विद्यमान आकाश का निश्चय किया जाता है ।
  • अन्य द्रव्यों के असम्भव, गति रूप परिणत सम्पूर्ण जीव-पुद्गलों के एक समय में समानरूप से गमन में हेतुरूप विशेष गुण से ही विद्यमान धर्म द्रव्य का निश्चय किया जाता है । और उसी प्रकार
  • अन्य द्रव्यों के असम्भव स्थिति रूप परिणत सम्पूर्ण जीव-पुद्गलों की एक समय में समान रूप से स्थिति में हेतु रूप विशेष गुण से ही विद्यमान अधर्म द्रव्य का निश्चय किया जाता है ।
  • अन्य द्रव्यों के असम्भव, सभी द्रव्यों को एक साथ पर्याय रूप परिणमन में हेतु रूप विशेष गुण से ही विद्यमान काल द्रव्य का निश्चय किया जाता है ।
  • अन्य अचेतन पाँचों द्रव्यों के असम्भव, सभी जीवों में पाये जाने वाले परिपूर्ण निर्मल केवलज्ञान-केवलदर्शन (मात्र ज्ञान-दर्शन) दो विशेष गुणों से ही विद्यमान शुद्ध बुद्ध एक स्वभावी परमात्मद्रव्य का निश्चय किया जाता है ।
यहाँ अर्थ यह है कि यद्यपि पाँच द्रव्य जीव का उपकार करते हैं, तथापि वे दुःख के कारण ही हैं- ऐसा जानकर अक्षय-अनन्त सुखादि के कारणभूत विशुद्ध ज्ञान-दर्शन उपयोग स्वभावी परमात्मद्रव्य का ही मन द्वारा ध्यान करना चाहिये, उसे ही वचनों से बोलना चाहिये और शरीर से उसके ही साधक अनुष्ठान करना चाहिये ॥१४३-१४४॥