+ अब, वे ही प्राण भेद-नय से दस प्रकार के होते हैं, ऐसा आवेदन करते हैं (मर्यादा पूर्वक ज्ञान कराते हैं) -- -
पंच वि इंदियपाणा मणवचिकाया य तिण्णि बलपाणा ।
आणप्पाणप्पाणो आउगपाणेण होंति दसपाणा ॥158॥
पाँच इन्द्रिय प्राण मन-वच-काय त्रय बल प्राण हैं
आयु श्वासोच्छ्वास जिनवर कहे ये दश प्राण हैं ॥१५८॥

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ त एवप्राणा भेदनयेन दशविधा भवन्तीत्यावेदयति --
इन्द्रियप्राणः पञ्चविधः, त्रिधा बलप्राणः, पुनश्चैक आनपानप्राणः, आयुःप्राणश्चेति भेदेन दशप्राणास्तेऽपि चिदानन्दैकस्वभावात्परमात्मनो निश्चयेन भिन्ना ज्ञातव्या इत्यभिप्रायः ॥१५८॥



पाँच प्रकार के इन्द्रिय प्राण, तीन प्रकार के बल प्राण और एक स्वासोच्छ्वास और एक आयु प्राण- इस प्रकार भेद से दस प्राण हैं; वे भी निश्चय से ज्ञानानन्द एक स्वभावी परमात्मा से भिन्न जानना चाहिये - ऐसा अभिप्राय है ॥१५८॥