
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ भावबन्धयुक्तिं द्रव्यबन्धस्वरूपं प्रज्ञापयति - अयमात्मा साकारनिराकारपरिच्छेदात्मकत्वात्परिच्छेद्यतामापद्यमानमर्थजातं येनैव मोहरूपेण रागरूपेण द्वेषरूपेण वा भावेन पश्यति जानाति च तेनैवोपरज्यत एव । योऽयमुपराग: स खलु स्निग्धरुक्षत्वस्थानीयो भावबन्ध: । अथ पुनस्तेनैव पौद्गलिकं कर्म बध्यत एव । इत्येष भावबन्धप्रत्ययो द्रव्यबन्ध: ॥१७६॥ यह आत्मा साकार और निराकार प्रतिभास-स्वरूप (ज्ञान और दर्शनस्वरूप) होने से प्रतिभास्य (प्रतिभासित होने योग्य) पदार्थ-समूह को जिस मोहरूप, रागरूप या द्वेषरूप भाव से देखता है और जानता है, उसी से उपरक्त होता है । जो यह उपराग (विकार) है वह वास्तव में स्निग्ध-रूक्षत्व-स्थानीय भावबंध है । और उसी से अवश्य पौद्गलिक कर्म बँधता है । इस प्रकार यह द्रव्यबंध का निमित्त भावबंध है ॥१७६॥ |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ भावबन्ध-युक्तिं द्रव्यबन्धस्वरूपं च प्रतिपादयति -- भावेण जेण भावेन परिणामेन येन जीवो जीवः कर्ता पेच्छदि जाणादि निर्विकल्पदर्शनपरिणामेन पश्यति सविकल्पज्ञानपरिणामेन जानाति । किं कर्मतापन्नं, आगदं विसये आगतं प्राप्तं किमपीष्टानिष्टं वस्तु पञ्चेन्द्रियविषये । रज्जदि तेणेव पुणो रज्यतेतेनैव पुनः आदिमध्यान्तवर्जितं रागादिदोषरहितं चिज्ज्योतिःस्वरूपं निजात्मद्रव्यमरोचमानस्तथैवाजानन् सन् समस्तरागादिविकल्पपरिहारेणाभावयंश्च तेनैव पूर्वोक्तज्ञानदर्शनोपयोगेन रज्यते रागं करोति इति भावबन्धयुक्तिः । बज्झदि कम्म त्ति उवदेसो तेन भावबन्धेन नवतरद्रव्यकर्म बध्नातीति द्रव्यबन्धस्वरूपं चेत्युपदेशः ॥१८८॥ एवं भावबन्धकथनमुख्यतया गाथाद्वयेन द्वितीयस्थलं गतम् । [भावेण जेण] जिस भाव--परिणाम से [जीवो] जीव-रूपी कर्ता [पेच्छदि जाणादि] निर्विकल्प दर्शनरूप पर्याय से देखता है और सविकल्प ज्ञानरूप पर्याय से जानता है । कर्मता को प्राप्त किसे जानता है ? [आगदं विसये] आये हुये -- प्राप्त हुये कुछ भी इष्ट-अनिष्ट वस्तु -- पंचेंद्रिय विषयों को देखता व जानता है, उन पंचेंद्रिय विषयों में । [रज्जदि तेणेव पुणो] उसी से फिर राग करता है, आदि-मध्य-अन्त से रहित रागादि दोष रहित, चैतन्य-ज्योति-स्वरूप, निज आत्म-द्रव्य की रुचि नहीं करता हुआ तथा उसे ही नहीं जानता हुआ और सम्पूर्ण रागादि विकल्पों के त्याग-पूर्वक उसकी ही भावना नहीं करता हुआ, पहले कहे गये ज्ञान-दर्शन उपयोग द्वारा राग करता है -- इसप्रकार भाव बन्ध की युक्ति है । [बज्झदि कम्म त्ति उवदेसो] उस भाव-बन्ध से नवीन द्रव्य-कर्म बंधता है -- ऐसा द्रव्य बन्ध का स्वरूप है -- ऐसा उपदेश है ॥१८८॥ इसप्रकर भाव-बन्ध कथन की मुख्यता से दो गाथाओं द्वारा दूसरा स्थल पूर्ण हुआ । |