
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ पुद्गलजीवतदुभयबन्धस्वरूपं ज्ञापयति - यस्तावदत्र कर्मणां स्निग्धरूक्षत्वस्पर्शविशेषैरेकत्वपरिणाम: स केवलपुद्गलबन्ध: । यस्तु जीवस्यौपाधिकमोहराद्वेषपर्यायैरेकत्वपरिणाम: स केवलजीवबन्ध: । य: पुन: जीवकर्मपुद्गलयो: परस्परपरिणामनिमित्तमात्रत्वेन विशिष्टतर: परस्परमवगाह: स तदुभयबन्ध: ॥१७७॥ प्रथम तो यहाँ,
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जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ पूर्वनवतरपुद्गलद्रव्यकर्मणोः परस्परबन्धो, जीवस्य तु रागादिभावेन सह बन्धो, जीवस्यैव नवतर-द्रव्यकर्मणा सह चेति त्रिविधबन्धस्वरूपं प्रज्ञापयति -- फासेहिं पोग्गलाणं बंधो स्पर्शैः पुद्गलानां बन्धः । पूर्वनवतरपुद्गलद्रव्यकर्मणोर्जीवगतरागादिभावनिमित्तेन स्वकीयस्निग्धरूक्षोपादानकारणेन च परस्पर-स्पर्शसंयोगेन योऽसौ बन्धः स पुद्गलबन्धः । जीवस्स रागमादीहिं जीवस्य रागादिभिः । निरुपराग-परमचैतन्यरूपनिजात्मतत्त्वभावनाच्युतस्य जीवस्य यद्रागादिभिः सह परिणमनं स जीवबन्ध इति । अण्णोण्णस्सवगाहो पुग्गलजीवप्पगो भणिदो अन्योन्यस्यावगाहः पुद्गलजीवात्मको भणितः । निर्विकार-स्वसंवेदनज्ञानरहितत्वेन स्निग्धरूक्षस्थानीयरागद्वेषपरिणतजीवस्य बन्धयोग्यस्निग्धरूक्षपरिणामपरिणत-पुद्गलस्य च योऽसौ परस्परावगाहलक्षणः स इत्थंभूतबन्धो जीवपुद्गलबन्ध इति त्रिविधबन्धलक्षणं ज्ञातव्यम् ॥१८९॥ [फासेहिं पोग्गलाणं बंधो] स्पर्शों से पुद्गलों का बन्ध । पहले के और नवीन पुद्गल द्रव्य-कर्मों का, जीवगत रागादि भावों के निमित्त से और अपने स्निग्ध और रूक्षरूप उपादान कारण से परस्पर- स्पर्श के संयोग द्वारा जो वह बन्ध है, वह पुद्गलबन्ध है । [जीवस्स रागमादीहिं] जीव का रागादि से । उपराग (मलिनता) रहित परम-चैतन्यरूप-निजात्मतत्त्व की भावना से च्युत जीव का, जो रागादि के साथ परिणमन है, वह जीवबन्ध है । [अण्णोण्णमवगाहो पोग्गलजीवप्पगो भणिदो] परस्पर का अवगाह पुद्गल-जीवात्मक कहा गया है । विकार रहित-स्वसंवेदन ज्ञान से रहित होने के कारण, स्निग्ध-रूक्ष के स्थानीय राग-द्वेष रूप परिणत जीव का और बन्ध योग्य स्निग्ध-रूक्ष परिणाम परिणत पुद्गल का, जो वह परस्पर अवगाह लक्षण बन्ध है, वह इसप्रकार का बंध जीव्-पुद्गल-बन्ध -- उभय-बंध कहलाता है -- इसप्रकार तीन प्रकार के बन्धों का लक्षण जानना चाहिये ॥१८९॥ |