
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ विशिष्ट-परिणामविशेषमविशिष्टपरिणामं च कारणे कार्यमुपचर्य कार्यत्वेन निर्दिशति - द्विविधस्तावत्परिणाम: परद्रव्यप्रवृत्त: स्वद्रव्यप्रवृत्तश्च । तत्र परद्रव्यप्रवृत्त: परोपरक्तत्वा-द्विशिष्टपरिणाम:, स्वद्रव्यप्रवृत्तस्तु परानुपरक्तत्वादविशिष्टपरिणाम: । तत्रोक्तौ द्वौ विशिष्ट-परिणामस्य विशेषौ, शुभपरिणामोऽशुभपरिणामश्च । तत्र पुण्यपुद्गलबन्धकारणत्वात् शुभ-परिणाम: पुण्यं, पापपुद्गलबन्धकारणत्वादशुभपरिणाम: पापम् । अविशिष्टपरिणामस्य तु शुद्धत्वेनैकत्वान्नास्ति विशेष: । स काले संसारदु:खहेतुकर्मपुद्गलक्षयकारणत्वात्संसारदु:ख-हेतुकर्मपुद्गलक्षयात्मको मोक्ष एव ॥१८१॥ प्रथम तो परिणाम दो प्रकार का है—परद्रव्यप्रवृत्त (परद्रव्य के प्रति प्रवर्तमान) और स्वद्रव्यप्रवृत्त । इनमें से परद्रव्यप्रवृत्तपरिणाम पर के द्वारा उपरक्त (पर के निमित्त से विकारी) होने से विशिष्ट परिणाम है और स्वद्रव्यप्रवृत्त परिणाम पर के द्वारा उपरक्त न होने से अविशिष्ट परिणाम है । उसमें विशिष्ट परिणाम के पूर्वोक्त दो भेद हैं—शुभपरिणाम और अशुभ परिणाम । उनमें पुण्यरूप पुद्गल के बंध का कारण होने से शुभपरिणाम पुण्य है और पापरूप पुद्गल के बंध का कारण होने से अशुभ परिणाम पाप है । अविशिष्ट परिणाम तो शुद्ध होने से एक है इसलिये उसके भेद नहीं हैं । वह (अविशिष्ट परिणाम) यथाकाल संसारदुःख के हेतुभूत कर्मपुद्गल के क्षय का कारण होने से संसारदुःख का हेतुभूत कर्मपुद्गल का क्षयस्वरूप मोक्ष ही है । |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ द्रव्यरूपपुण्यपापबन्धकारणत्वाच्छुभाशुभपरिणामयोःपुण्यपापसंज्ञां शुभाशुभरहितशुद्धोपयोगपरिणामस्य मोक्षकारणत्वं च कथयति -- सुहपरिणामो पुण्णं द्रव्यपुण्यबन्धकारणत्वाच्छुभपरिणामः पुण्यं भण्यते । असुहो पावं ति भणिदं द्रव्यपापबन्धकारणत्वाद-शुभपरिणामः पापं भण्यते । केषु विषयेषु योऽसौ शुभाशुभपरिणामः । अण्णेसु निजशुद्धात्मनःसकाशादन्येषु शुभाशुभबहिर्द्रव्येषु । परिणामो णण्णगदो परिणामो नान्यगतोऽनन्यगतः स्वस्वरूपस्थइत्यर्थंः । स इत्थंभूतः शुद्धोपयोगलक्षणः परिणामः दुक्खक्खयकारणं दुःखक्षयकारणं दुःखक्षयाभिधान-मोक्षस्य कारणं भणिदो भणितः । क्व भणितः । समये परमागमे लब्धिकाले वा । किंच, मिथ्यादृष्टिसासादनमिश्रगुणस्थानत्रये तारतम्येनाशुभपरिणामो भवतीति पूर्वं भणितमास्ते, अविरत-देशविरतप्रमत्तसंयतसंज्ञगुणस्थानत्रये तारतम्येन शुभपरिणामश्च भणितः, अप्रमत्तादिक्षीणकषायान्तगुण-स्थानेषु तारतम्येन शुद्धोपयोगोऽपि भणितः । नयविवक्षायां मिथ्यादृष्टयादिक्षीणकषायान्तगुणस्थानेषु पुनरशुद्धनिश्चयनयो भवत्येव । तत्राशुद्धनिश्चयमध्ये शुद्धोपयोगः कथं लभ्यत इति शिष्येण पूर्वपक्षेकृते सति प्रत्युत्तरं ददाति — वस्त्वेकदेशपरीक्षा तावन्नयलक्षणं, शुभाशुभशुद्धद्रव्यावलम्बनमुपयोग-लक्षणं चेति; तेन कारणेनाशुद्धनिश्चयमध्येऽपि शुद्धात्मावलम्बनत्वात् शुद्धध्येयत्वात् शुद्धसाधकत्वाच्च शुद्धोपयोगपरिणामो लभ्यत इति नयलक्षणमुपयोगलक्षणं च यथासंभवं सर्वत्र ज्ञातव्यम् । अत्र योऽसौरागादिविकल्पोपाधिरहितसमाधिलक्षणशुद्धोपयोगो मुक्तिकारणं भणितः स तु शुद्धात्मद्रव्य-लक्षणाद्धयेयभूताच्छुद्धपारिणामिकभावादभेदप्रधानद्रव्यार्थिकनयेनाभिन्नोऽपि भेदप्रधानपर्यायार्थिकनयेन भिन्नः । कस्मादिति चेत् । अयमेकदेशनिरावरणत्वेन क्षायोपशमिकखण्डज्ञानव्यक्तिरूपः, स चपारिणामिकः सकलावरणरहितत्वेनाखण्डज्ञानव्यक्तिरूपः; अयं तु सादिसान्तत्वेन विनश्वरः, स च अनाद्यनन्तत्वेनाविनश्वरः । यदि पुनरेकान्तेनाभेदो भवति तर्हि घटोत्पत्तौ मृत्पिण्डविनाशवत्ध्यानपर्यायविनाशे मोक्षे जाते सति ध्येयरूपपारिणामिकस्यापि विनाशो भवतीत्यर्थः । तत एव ज्ञायतेशुद्धपारिणामिकभावो ध्येयरूपो भवति, ध्यानभावनारूपो न भवति । कस्मात् । ध्यानस्यविनश्वरत्वादिति ॥१८१॥ एवं द्रव्यबन्धकारणत्वात् मिथ्यात्वरागादिविकल्परूपो भावबन्ध एव निश्चयेन बन्ध इति कथनमुख्यतया गाथात्रयेण चतुर्थस्थलं गतम् । [सुहपरिणामो पुण्णं] द्रव्य-पुण्यबन्ध का कारण होने से शुभ परिणाम पुण्य कहलाता है । [असुहो पावं ति भणियं] द्रव्य-पापबन्ध का कारण होने से अशुभ परिणाम पाप कहलाता है । जो ये शुभ-अशुभ परिणाम हैं, वे किन विषयों में गये हुये पुण्य-पाप रूप कहे हैं ? [अण्णेसु] निज शुद्धात्मा से भिन्न, दूसरे शुभ-अशुभ बाह्य द्रव्यों में गये हुये पुण्य-पाप रूप कहे गये हैं । [परिणामो णण्णगदो] परिणाम दूसरे में गये हुये नहीं हैं अर्थात् अनन्यगत -- अपने स्वरूप में स्थित हैं -- ऐसा अर्थ है । वह इसप्रकार का शुद्धोपयोग लक्षण परिणाम [दुक्खक्खयकारणं] दुःखक्षय का कारण -- दुःखों का विनाश नामक मोक्ष का कारण [ भणिदो] कहा गया है । वह मोक्ष का कारण कहाँ कहा गया है ? [समये] परमागम में वह मोक्ष का कारण कहा गया है । अथवा वह मोक्ष का कारण कब कहा गया है ? वह काललब्धि में -- समय की प्राप्ति होने पर मोक्ष का कारण कहा गया है । विशेष यह है --
वहाँ अशुद्ध-निश्चयनय के बीच शुद्धोपयोग कैसे प्राप्त होता है? ऐसा शिष्य द्वारा पूर्वपक्ष (प्रश्न) किये जाने पर उसके प्रति उत्तर देते हैं - प्रथम तो वस्तु की एकदेश परीक्षा नय का लक्षण है और शुभ-अशुभ अथवा शुद्ध द्रव्य का अवलम्बन उपयोग का लक्षण है; इसप्रकार अशुद्ध-निश्चय के बीच में शुद्धात्मा का अवलम्बन होने से, शुद्ध ध्येय होने से और शुद्ध का साधक होने से, शुद्धोपयोग परिणाम प्राप्त होता है -- ऐसा नय का और उपयोग का लक्षण यथा संभव सब जगह जानना चाहिये । यहाँ जो यह रागादि विकल्पों की उपाधि रहित समाधि लक्षण शुद्धोपयोग मुक्ति का कारण कहा गया है, वह शुद्धात्मद्रव्य का लक्षण होने से, ध्येयभूत शुद्ध पारिणामिक भाव से अभेद-प्रधान-द्रव्यार्थिकनय की अपेक्षा अभिन्न होने पर भी, भेद-प्रधान-पर्यायार्थिकनय की अपेक्षा भिन्न है । यह भिन्न क्यों है? यदि ऐसा प्रश्न हो तो (उत्तर देते हैं) -- यह शुद्धोपयोग एक देश आवरण रहित होने से, क्षायोपशमिक खण्डज्ञान की प्रगटतारूप है और वह पारिणामिक भाव सम्पूर्ण आवरणों से रहित होने के कारण अखण्डज्ञान की प्रगटता रूप है, यह सादि-सान्त होने से नश्वर है और वह अनादि-अनन्त होने से अविनश्वर है । और यदि एकान्त से अभेद होता, तो घड़े की उत्पत्ति में मिट्टी-पिण्ड के विनाश के समान ध्यान पर्याय के विनाश में मोक्ष उत्पन्न होने पर ध्येरयरूप पारिणामिक का भी विनाश हो जाता -- एसा अर्थ है । इससे ही ज्ञात होता है कि शुद्ध-पारिणामिक भाव ध्येयरूप है, ध्यान भावनारूप नहीं है । वह ध्यान भावनारूप क्यों नहीं है ? ध्यान के विनाशशील होने से वह ध्यान भावनारूप नहीं है । इसप्रकार द्रव्य-बन्ध का कारण होने से मिथ्यात्व-रागादि विकल्प-रूप भाव-बन्ध ही, निश्चय से बन्ध है -- ऐसे कथन की मुख्यता से, तीन गाथाओं द्वारा चौथा स्थल पूर्ण हुआ । |