+ अब, जीव की स्वद्रव्य में प्रवृत्ति और परद्रव्य से निवृत्ति की सिद्धि के लिये स्व-पर का विभाग बतलाते हैं -
भणिदा पुढविप्पमुहा जीवणिकायाध थावरा य तसा । (182)
अण्णा ते जीवादो जीवो वि य तेहिंदो अण्णो ॥194॥
भणिताः पृथिवीप्रमुखा जीवनिकाया अथ स्थावराश्च त्रसाः ।
अन्ये ते जीवाज्जीवोऽपि च तेभ्योऽन्यः ॥१८२॥
पृथ्वी आदि थावरा त्रस कहे जीव निकाय हैं
वे जीव से हैं अन्य एवं जीव उनसे अन्य है ॥१९४॥
अन्वयार्थ : [अथ] अब [स्थावरा: च त्रसा:] स्थावर और त्रस ऐसे जो [पृथिवीप्रमुखा:] पृथ्वी आदि [जीव निकाया:] जीवनिकाय [भणिता:] कहे गये हैं [ते] वे [जीवात् अन्ये] जीव से अन्य हैं, [च] और [जीव: अपि] जीव भी [तेभ्य: अन्य:] उनसे अन्य है ।
Meaning : Then, the soul-bodies (jīvanikāya), which have been called immobile (sthāvara) - the earth-bodied (prathivīkāya) and the rest - and the mobile (trasa), are distinct from the substance of soul (jīvadravya) and the substance of soul (jīvadravya) too is distinct from these soul-bodies (jīvanikāya).

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ जीवस्य स्वपरद्रव्यप्रवृत्तिनिवृत्तिसिद्धये स्वपरविभागं दर्शयति -

य एते पृथिवीप्रभृतय: षड्‌जीवनिकायास्त्रसस्थावरभेदेनाभ्युपगम्यन्ते ते खल्वचेतनत्वादन्ये जीवात्‌, जीवोऽपि च चेतनत्वादन्यस्तेभ्य: । अत्र षड्‌जीवनिकायात्मन: परद्रव्यमेक एवात्मा स्वद्रव्यम्‌ ॥१८२॥




जो यह पृथ्वी इत्यादि षट् जीवनिकाय त्रसस्थावर के भेदपूर्वक माने जाते हैं, वे वास्तव में अचेतनत्त्व के कारण जीव से अन्य हैं, और जीव भी चेतनत्व के कारण उनसे अन्य है । यहाँ (यह कहा है कि) षट् जीवनिकाय आत्मा को परद्रव्य है, आत्मा एक ही स्वद्रव्य है ॥१८२॥
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ जीवस्य स्वद्रव्यप्रवृत्तिपरद्रव्य-निवृत्तिनिमित्तं षड्जीवनिकायैः सह भेदविज्ञानं दर्शयति --
भणिदा पुढविप्पमुहा भणिताः परमागमे कथिताःपृथिवीप्रमुखाः । ते के । जीवणिकाया जीवसमूहाः । अध अथ । कथंभूताः । थावरा य तसा स्थावराश्चत्रसाः । ते च किंविशिष्टाः । अण्णा ते अन्ये भिन्नास्ते । कस्मात् । जीवादो शुद्धबुद्धैकजीवस्वभावात् । जीवो वि य तेहिंदो अण्णो जीवोऽपि च तेभ्योऽन्य इति । तथाहि --
टङ्कोत्कीर्णज्ञायकैक स्वभावपरमात्म-तत्त्वभावनारहितेन जीवेन यदुपार्जितं त्रसस्थावरनामकर्म तदुदयजनितत्वादचेतनत्वाच्च त्रसस्थावर-जीवनिकायाः शुद्धचैतन्यस्वभावजीवाद्भिन्नाः । जीवोऽपि च तेभ्यो विलक्षणत्वाद्भिन्न इति । अत्रैवंभेदविज्ञाने जाते सति मोक्षार्थी जीवः स्वद्रव्ये प्रवृत्तिं परद्रव्ये निवृत्तिं च करोतीति भावार्थः ॥१८२॥


[भणिदा पुढविप्पमुहा] परमागम में पृथ्वी प्रमुख कहे गये हैं । पृथ्वी आदि वे कौन हैं ? [जीवणिकाया] पृथ्वी आदि वे जीव-निकाय हैं -- जीव-समूह हैं । [अध] अब, वे पृथ्वी आदि कैसे हैं ? [थावरा य तसा] वे स्थावर और त्रस रूप हैं । और वे किस विशेषतावाले हैं ? [अण्णा ते] वे अन्य-भिन्न हैं । वे किससे भिन्न हैं ? [जीवादो] वे शुद्ध-बुद्ध एक जीव स्वभाव से भिन्न हैं । [जीवो वि य तेहिंदो अण्णो] और जीव भी उनसे भिन्न है ।

वह इसप्रकार -- टाँकी से उकेरे हुये के समान, ज्ञायक एक स्वभाव परमात्म-तत्त्व की भावना से रहित जीव द्वारा उपार्जित किये गये -- बाँधे गये जो त्रस-स्थावर नाम-कर्म उनके उदय से उत्पन्न होने के कारण और अचेतन होने के कारण त्रस-स्थावर जीव-निकाय, शुद्ध चैतन्य स्वभावी जीव से भिन्न हैं । और जीव भी उनसे विलक्षण होने के कारण भिन्न है । यहाँ इस प्रकार भेद-विज्ञान उत्पन्न हो जाने पर, मोक्षार्थी जीव स्व-द्रव्य में प्रवृत्ति और पर-द्रव्य-निवृत्ति करता है -- यह भावार्थ है ॥१९४॥