
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
ततो हि श्रामण्यार्थी प्रणतोऽनुगृहीतश्च भवति । तथाहि - आचरिताचारितसमस्तविरति-प्रवृत्तिसमानात्मरूपश्रामण्यत्वात् श्रमणं, एवंविधश्रामण्याचरणाचारणप्रवीणत्वात् गुणाढय्यं, सकललौकिकजननि:शंङ्कसेवनीयत्वात् कुलक्रमागतक्रौर्यादिदोषवर्जितत्वाच्च कुलविशिष्टं, अन्तरङ्गशुद्धरूपानुमापकबहिरङ्गशुद्धरूपत्वात् रूपविशिष्टं, शैशववार्धक्यकृतबुद्धिविक्लवत्वा भावाद्यौवनोद्रेकविक्रियाविविक्तबुद्धित्वाच्च वयोविशिष्टं, नि:शेषितयथोक्तश्रामण्याचरणा-चारणविषयपौरुषेयदोषत्वेन मुमुक्षुभिरभ्युपगततरत्वात् श्रमणैरिष्टतरं च गणिनं शुद्धात्मतत्त्वो-पलम्भसाधकमाचार्यं शुद्धात्मतत्त्वोपलम्भसिद्धया मामनुगृहाणेत्युपसर्पन् प्रणतो भवति । एवमियं ते शुद्धात्मतत्त्वोपलम्भसिद्धिरिति तेन प्रार्थितार्थेन संयुज्यमानोऽनुगृहीतो भवति ॥२०३॥ पश्चात् श्रामण्यार्थी प्रणत और अनुगृहीत होता है । वह इस प्रकार है कि --
अब गुरु द्वारा स्वीकृत होता हुआ वह कैसा होता है ऐसा उपदेश देते हैं - |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ जिनदीक्षार्थी भव्यो जैनाचार्य-माश्रयति -- समणं निन्दाप्रशंसादिसमचित्तत्वेन पूर्वसूत्रोदितनिश्चयव्यवहारपञ्चाचारस्याचरणाचारण-प्रवीणत्वात् श्रमणम् । गुणड्ढं चतुरशीतिलक्षगुणाष्टादशसहस्रशीलसहकारिकारणोत्तमनिजशुद्धात्मानुभूति-गुणेनाढयं भृतं परिपूर्णत्वाद्गुणाढयम् । कुलरूववयोविसिट्ठं लोकदुगुंच्छारहितत्वेन जिनदीक्षायोग्यं कुलं भण्यते । अन्तरङ्गशुद्धात्मानुभूतिज्ञापकं निर्ग्रन्थनिर्विकारं रूपमुच्यते । शुद्धात्मसंवित्तिविनाशकारिवृद्ध-बालयौवनोद्रेकजनितबुद्धिवैकल्यरहितं वयश्चेति । तैः कुलरूपवयोभिर्विशिष्टत्वात् कुलरूपवयो-विशिष्टम् । इट्ठदरं इष्टतरं सम्मतम् । कैः । समणेहिं निजपरमात्मतत्त्वभावनासहितसमचित्तश्रमणैर-न्याचार्यैः । गणिं एवंविधगुणविशिष्टं परमात्मभावनासाधकदीक्षादायकमाचार्यम् । तं पि पणदो न केवलंतमाचार्यमाश्रितो भवति, प्रणतोऽपि भवति । केन रूपेण । पडिच्छ मं हे भगवन्, अनन्तज्ञानादि-जिनगुणसंपत्तिकारणभूताया अनादिकालेऽत्यन्तदुर्लभाया भावसहितजिनदीक्षायाः प्रदानेन प्रसादेन मां प्रतीच्छ स्वीकुरु । चेदि अणुगहिदो न केवलं प्रणतो भवति, तेनाचार्येणानुगृहीतः स्वीकृतश्च भवति । हेभव्य, निस्सारसंसारे दुर्लभबोधिं प्राप्य निजशुद्धात्मभावनारूपया निश्चयचतुर्विधाराधनया मनुष्यजन्म सफलं कुर्वित्यनेन प्रकारेणानुगृहीतो भवतीत्यर्थः ॥२०३॥ [समणं] निन्दा प्रशंसा आदि में समान हृदयी-समता भाववाले होने से पहले (२१६ वी) गाथा में कहे गये निश्चय पंचाचार और व्यवहार पंचाचार का आचरण करने और कराने में प्रवीण-चतुर होने के कारण श्रमण हैं । [गुणड्ढं] चौरासी लाख गुणों और अठारह हजार शीलों के सहकारी कारणभूत, उत्तम अपने शुद्धात्मा की अनुभूति रूपी गुण से आढ्य - भरे हुए - परिपूर्ण होने के कारण गुणाढ्य हैं । [कुलरूववयोविसिट्ठं] लोक सम्बन्धी दुगुंच्छा - घृणा - निन्दा से रहित होने के कारण जिन-दीक्षा के योग्य को कुल कहते हैं । अन्दर में शुद्धात्मा की अनुभूति को बतानेवाले, परिग्रहरहित (गाँठ रहित), विकार रहित वेष को रूप कहते हैं । शुद्धात्मा की अनुभूति को नष्ट करनेवाली वृद्धावस्था, बालावस्था, और यौवनावस्था सम्बन्धी उद्रेक से उत्पन्न बुद्धि की विकलता से रहित वय है । उन कुल-रूप और वय से विशिष्ट होने के कारण कुल-रूप-वय विशिष्ट हैं । [इट्ठदरं] इष्टतर-सम्मत-स्वीकृत हैं । किनसे स्वीकृत हैं? [समणेहिं] अपने परमात्म तत्त्व की भावना से सहित, समचित्त-समभाव परिणत श्रमणों-अन्य आचार्यों से स्वीकृत है । [गणिं] इसप्रकार के गुणों से विशिष्ट, परमात्मभावना के साधक, दीक्षा देनेवाले आचार्य के आश्रित होता है । [तं पि पणदो] न केवल उन आचार्य के आश्रित होता है, वरन् प्रणत-नम्रीभूत-नमन करनेवाला भी होता है । किस रूप में प्रणत होता है? [पडिच्छ मं] हे भगवन्! अनन्त ज्ञान आदि अपने गुणों रूपी सम्पत्ति की प्रगटता की कारणभूत, अनादि काल में अत्यन्त दुर्लभ, भाव सहित जिनदीक्षा को प्रदान करनेरूप प्रसाद से, मुझे स्वीकार करें - इसप्रकार प्रणत होता है । [चेदि अणुगहिदो] न केवल प्रणत होता है, अपितु उन आचार्य द्वारा अनुग्रहीत-स्वीकार भी किया जाता है । हे भव्य! सार रहित संसार में दुर्लभ बोधि-रत्नत्रय को प्राप्तकर, शुद्धात्मा की भावनारूप निश्चय चार प्रकार की आराधना से मनुष्य जन्म को सफल करो - इसप्रकार अनुगृहीत होता है - ऐसा अर्थ है । |