
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
ततोऽपि श्रामण्यार्थी यथाजातरूपधरो भवति । तथाहि - अहं तावन्न किंचिदपि परेषां भवामि परेऽपि न किंचिदपि मम भवन्ति, सर्वद्रव्याणां परै: सह तत्त्वत: समस्तसंबंधशून्यत्वात् । तदिह षड्द्रव्यात्मके लोके न मम किंचिदप्यात्मनोऽन्यदस्तीति निश्चितमति: परद्रव्य-स्वस्वामिसंबंधनिबंधनानामिन्द्रियनोइन्द्रियाणां जयेन जितेन्द्रियश्च सन् धृतयथानिष्पन्नात्म-द्रव्यशुद्धरूपत्वेन यथाजातरूपधरो भवति ॥२०४॥ और तत्पश्चात् श्रामण्यार्थी यथाजात-रूपधर होता है । वह इस प्रकार कि :- 'प्रथम तो मैं किंचित्मात्र भी पर का नहीं हूँ पर भी किंचित्मात्र मेरे नहीं हैं, क्योंकि समस्त द्रव्य तत्त्वतः पर के साथ समस्त सम्बन्ध रहित हैं; इसलिये इस षड्द्रव्यात्मक लोक में आत्मा से अन्य कुछ भी मेरा नहीं है;' -- इस प्रकार निश्चित मतिवाला (वर्तता हुआ) और परद्रव्यों के साथ स्व-स्वामि-संबंध जिनका आधार है ऐसी इन्द्रियों और नो-इन्द्रियों के जय से जितेन्द्रिय होता हुआ वह (श्रामण्यार्थी) आत्मद्रव्य का यथानिष्पन्न शुद्धरूप धारण करने से यथाजात-रूपधर होता है ॥२०४॥ अब, अनादि-संसार से अनभ्यस्त होने से जो अत्यन्त अप्रसिद्ध है और अभिनव-अभ्यास में कौशल्य द्वारा जिसकी सिद्धि उपलब्ध होती है ऐसे इस यथाजात-रूपधरपने के बहिरंग और अंतरंग दो लिंगों का उपदेश करते हैं :- |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ गुरुणा स्वीकृतः सन् कीदृशोभवतीत्युपदिशति -- णाहं होमि परेसिं नाहं भवामि परेषाम् । निजशुद्धात्मनः सकशात्परेषां भिन्नद्रव्याणां संबन्धी न भवाम्यहम् । ण मे परे न मे संबन्धीनि परद्रव्याणि । णत्थि मज्झमिह किंचि नास्ति ममेहकिंचित् । इह जगति निजशुद्धात्मनो भिन्नं किंचिदपि परद्रव्यं मम नास्ति । इदि णिच्छिदो इतिनिश्चितमतिर्जातः । जिदिंदो जादो इन्द्रियमनोजनितविकल्पजालरहितानन्तज्ञानादिगुणस्वरूपनिजपरमात्म-द्रव्याद्विपरीतेन्द्रियनोइन्द्रियाणां जयेन जितेन्द्रियश्च संजातः सन् जधजादरूवधरो यथाजातरूपधरः, व्यवहारेण नग्नत्वं यथाजातरूपं, निश्चयेन तु स्वात्मरूपं, तदित्थंभूतं यथाजातरूपं धरतीति यथाजात-रूपधरः निर्ग्रन्थो जात इत्यर्थः ॥२०४॥ [णाहं होमि परेसिं] मैं पर का नहीं हूं । अपने शुद्धात्मा से भिन्न दूसरे द्रव्यों का मैं सम्बन्धी नहीं हूँ । [ण मे परे] पर द्रव्य मेरे सम्बन्धी नहीं हैं । [णत्थि मज्झमिह किंचि] यहाँ मेरा कुछ भी नहीं है ! इस लोक में अपने शुद्धात्मा से भिन्न कुछ भी पर द्रव्य मेरा नहीं है । [इदि णिच्छिदो] इसप्रसर निश्चित बुद्धिवाला । [जिदिंदो जादो] तथा इन्द्रिय और मन से उत्पन्न विकल्प समूहों से रहित, अनन्त ज्ञानादि गुण स्वरूप अपने परमात्मद्रव्य से विपरीत, इन्द्रिय और मन को जीतने से जितेन्द्रिय होता हुआ [जधजादरूवधरो] यथाजातरूपधर व्यवहार से नग्नता यथाजातरूप है तथा निश्चय से अपना आत्मरूप यथाजातरूप है, वह इसप्रकार यथाजातरूप को धारण करता है - इसप्रकार यथाजातरूपधर निर्ग्रंन्थ अर्थात् आरम्भ-परिग्रह से रहित नग्न दिगम्बर होता है - ऐसा अर्थ है ॥२१८॥ |