
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथैतदेवद्रढयति -- ण विणा वट्टदि णारी न विना वर्तते नारी एक्कं वा तेसु जीवलोयम्हि तेषु निर्दोषि-परमात्मध्यानविघातकेषु पूर्वोक्तदोषेषु मध्ये जीवलोके त्वेकमपि दोषं विहाय ण हि संउडं च गत्तं नहि स्फुटं संवृत्तं गात्रं च शरीरं, तम्हा तासिं च संवरणं तत एव च तासां संवरणं वस्त्रावरणं क्रियतइति ॥२४८॥ अब इसे ही दृढ़ करते हैं - [ण विणा वट्टदि णारी] स्त्री उनके बिना नहीं है, [एक्कं वा तेसु जीवलोयम्हि] उन दोषों रहित परमात्मा के ध्यान को नष्ट करनेवाले, पहले ( २४७ वीं गाथा में) कहे गये दोषों में से एक भी दोष को छोड़कर वह जीवलोक में नहीं है, [ण हि संउडं च गत्तं] वास्तव में उसका शरीर भी संवृत (ढंका हुआ) नहीं है, [तम्हा तासिं च संवरणं] और इसलिये उनका संवरण-वस्त्रावरण किया जाता है- उन्हें वस्त्रों से ढंका जाता है ॥२४८॥ |