चित्तस्सावो तासिं सित्थिल्लं अत्तवं च पक्खलणं ।
विज्जदि सहसा तासु अ उप्पादो सुहममणुआणं ॥249॥
चित्त चंचल शिथिल तन अर रक्त आवे अचानक ।
और उनके सूक्ष्म मानव सदा ही उत्पन्न हो ॥२४९॥
अन्वयार्थ : स्त्रियों के चित्त में चंचलता और उनमें शिथिलता होती है, तथा अचानक (ऋतु समय में) रक्त प्रवाहित होता है और उनमें सूक्ष्म मनुष्यों की उत्पत्ति होती है ॥२४९॥

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ पुनरपि निर्वाणप्रतिबन्धकदोषान्दर्शयति --
विज्जदि विद्यते तासु अ तासु च स्त्रीषु । किम् । चित्तस्सावो चित्तस्रवः, निःकामात्मतत्त्व-संवित्तिविनाशकचित्तस्य कामोद्रेकेण स्रवो रागसार्द्रभावः, तासिं तासां स्त्रीणां, सित्थिल्लं शिथिलस्यभावः शैथिल्यं, तद्भवमुक्तियोग्यपरिणामविषये चित्तदाढर्याभावः सत्त्वहीनपरिणाम इत्यर्थः, अत्तवं च
पक्खलणं
ऋतौ भवमार्तवं प्रस्खलनं रक्तस्रवणं, सहसा झटिति, मासे मासे दिनत्रयपर्यन्तंचित्तशुद्धिविनाशको रक्तस्रवो भवतीत्यर्थः, उप्पादो सुहममणुआणं उत्पाद उत्पत्तिः सूक्ष्मलब्ध्यपर्याप्त-मनुष्याणामिति ॥२४९॥


अब और भी निर्वाण को रोकनेवाले दोषों को दिखाते हैं -

[विज्जदि] पाया जाता है, [तासु अ] और उन स्त्रियों में । उन स्त्रियों में क्या पाया जाता है ? [चित्तस्सावि] चित्त का प्रवाह, काम वासना से रहित आत्मतत्त्व की अनुभूति को नष्ट करनेवाले मन का काम के उद्रेक (तीवता) से स्रव होना- राग से आर्द्र होना-चंचल होना उन स्त्रियों में पाया जाता है, [तासिं] उन स्त्रियों के [सित्थिल्लं] शिथिल का भाव- शिथिलता- उसी भव में मोक्ष जाने योग्य परिणामों के विषय में, मन की दृढ़ता का अभाव-सत्वहीन-कमजोर परिणाम होते है- ऐसा अर्थ है, [अत्तवं च पक्खलणं] ऋतु में होने वाले आर्तव का प्रस्खलन-रक्त का बहना, सहसा- जल्दी- प्रत्येक महिने में तीन दिन मन की शुद्धि को नष्ट करने वाला रक्त प्रवाह उनके होता है- ऐसा अर्थ है, [उप्पादो सुहममणुआणं] सूक्ष्म लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों की उत्पत्ति होती है ॥२४९॥