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स स्याद्विधिनिषेधात्मा, स्वधर्म-परधर्मयोः ।
समूर्तिर्बोधमूर्तित्वादमूर्तिश्च विपर्ययात् ॥8॥
अन्वयार्थ : [सः] वह [स्वधर्म-परधर्मयोः] स्व-धर्म और पर-धर्म में [क्रमशः विधिनिषेधात्मा] क्रमशः विधि और निषेध-रूप [स्यात्] होता है [सः] वह [बोधिमूर्तित्वात्] ज्ञान-मूर्ति होने से [मूर्तिः] मूर्तिरूप/साकार है [च] और [विपर्ययात्] विपरीत रूप वाला होने से [अमूर्तिः] अमूर्तिक है ॥८॥