+ लोभ को दुःख का करण देख और त्याग -
जोइय लोहु परिच्चयहि लोहु ण भल्लउ होइ ।
लोहासत्तउ सयलु जगु दुक्खु सहंतउ जोइ ॥113॥
योगिन् लोभं परित्यज लोभो न भद्रः भवति ।
लोभासक्तं सकलं जगद् दुःखं सहमानं पश्य ॥११३॥
अन्वयार्थ : [योगिन्] हे योगी, [लोभं परित्यज] लोभ छोड, [लोभो] लोभ [भद्रः न भवति] अच्छा नहीं है, [लोभासक्तं] लोभ में फँसे हुए [सकलं जगत्] सम्पूर्ण जगत् को [दुःखं सहमानं] दुःख सहते हुए [पश्य] देख ।
Meaning : Give up covetousness; it is not desirable. The whole world is involved in misery on account of covetousness.

  श्रीब्रह्मदेव