+ ज्ञान को छोड़कर कुछ भी आत्मा नहीं -
अप्पहँ णाणु परिच्चयवि अण्णु ण अत्थि सहाउ ।
इउ जाणेविणु जोइयहु परहँ म बंधउ राउ ॥155॥
आत्मनः ज्ञानं परित्यज्य अन्यो न अस्ति स्वभावः ।
इदं ज्ञात्वा योगिन् परस्मिन् मा बधान रागम् ॥१५५॥
अन्वयार्थ : [आत्मनः ज्ञानं] आत्म का ज्ञान को [परित्यज्य] छोड़कर [अन्यः स्वभावः] दूसरा स्वभाव [न अस्ति] नहीं है, [इदं ज्ञात्वा] ऐसा जानकर [योगिन्] हे योगी ! [परस्मिन्] पर-वस्तु से [रागम्] प्रीति [मा बधान] मत बाँध ।
Meaning : Self is Jnan Svabhava (knowledge or consciousness by nature); its Svabhava (real nature) is none other than this. Having known it, O Yogin! do not entertain Raga (love, desire or attachment) for anything else.

  श्रीब्रह्मदेव