
अप्पायत्तउ जं जि सुहु तेण जि करि संतोसु ।
पर सुहु वढ चिंतंताहँ हियइ ण फि ट्टइ सोसु ॥154॥
आत्मायत्तं यदेव सुखं तेनैव कुरु संतोषम् ।
परं सुखं वत्स चिन्तयतां हृदये न नश्यति शोषः ॥१५४॥
अन्वयार्थ : [वत्स] हे शिष्य ! [यदेव जो आत्मायत्तं सुखं] पर-द्रव्य से रहित आत्माधीन सुख है, [तेनैव] उसी में [संतोषम्] संतोष [कुरु] कर, [परं सुखं] इन्द्रियाधीन सुख का [चिंतयतां] चिन्तवन करने वालों के [हृदये शोषः] चित्त-दाह [न नश्यति] नहीं मिटता ।
Meaning : O soul ! Be contented in the Ati-Indriya Sukha
श्रीब्रह्मदेव