+ योग द्वारा मन को वश में कर -
अप्पा परहँ ण मेलविउ मणु मारिवि सहस त्ति ।
सो वढ जाएँ किं करइ जासु ण एही सत्ति ॥157॥
आत्मा परस्य न मेलितः मनो मारयित्वा सहसेति ।
स वत्स योगेन किं करोति यस्य न ईद्रशी शक्ति: ॥१५७॥
अन्वयार्थ : [सहसा मनः मारयित्वा] शीघ्र ही मन को वश में करके [आत्मा] आत्मा को [परस्य न मेलितः] पर में नहीं मिलाया, [वत्स] हे शिष्य, [यस्य ईदृशी] जिसकी ऐसी [शक्तिः न] शक्ति नहीं है, [सः योगेन] वह योग से [किं करोति] क्या कर सकता है ?
Meaning : By becoming a Yogi, what will he gain who cannot abstain from attaching his soul to Para-Padartha (foreign substances or things), or he who cannot control his mind by concentration ?

  श्रीब्रह्मदेव