
अप्पा मेल्लिवि णाणमउ अण्णु जे झायहिँ झाणु ।
वढ अण्णाण-वियंभियहँ कउ तहँ केवल-णाणु ॥158॥
आत्मानं मुक्त्वा ज्ञानमयं अन्यद् ये ध्यायन्ति ध्यानम् ।
वत्स अज्ञानविजृम्भितानां कुतः तेषां केवलज्ञानम् ॥१५८॥
अन्वयार्थ : [ज्ञानमयं आत्मानं मुक्त्वा] ज्ञानमयी आत्मा को छोड़कर [अन्यद् ये ध्यानम् ध्यायंति] अन्य का ध्यान जो लगाते हैं, [वत्स] हे वत्स, [तेषां अज्ञान विजृंभितानां] उस अज्ञान से मोहित को [केवलज्ञानम् कुतः] केवलज्ञान कैसे हो ?
Meaning : He who baving left his Nija Shuddha Atman consisting in infinite knowledge, etc., contemplates upon other objects, cannot obtain Kewala Jnana .
श्रीब्रह्मदेव