
तुट्टइ मोहु तडित्ति जहिँ मणु अत्थवणहँ जाइ ।
सो सामइ उवएसु कहि अण्णेँ देविं काइँ ॥161॥
त्रुटयति मोहः झटिति यत्र मनः अस्तमनं याति ।
तं स्वामिन् उपदेशं कथय अन्येन देवेन किम् ॥१६१॥
अन्वयार्थ : [स्वामिन्] हे स्वामी ! [तं उपदेशं कथय] उस उपदेश को कहो [यत्र मोहः झटिति त्रुटयति] जिससे मोह शीघ्र छूट जावे, [मनः अस्तमनं याति] और चंचल मन स्थिरता को प्राप्त हो जावे, [अन्य देवेन किम्] दूसरे देवताओं से क्या प्रयोजन है ?
Meaning : O Master ! Pray give me such advice as may speedily destroy Moha and make the mind steady. What purpose can be served by gods, etc. ?
श्रीब्रह्मदेव