+ समूल परिवर्तित, पुण्य-पाप से रहित धन्य -
उव्वस वसिया जो करइ वसिया करइ जु सुण्णु ।
बलि किज्जउँ तसु जोइयहिँ जासु ण पाउ ण पुण्णु ॥160॥
उद्वसान् वसितान् यः करोति वसितान् करोति यः शून्यान् ।
बलिं कुर्वेऽहं तस्य योगिनः यस्य न पापं न पुण्यम् ॥१६०॥
अन्वयार्थ : [यः] जो [उद्धसान्] (शुद्धोपयोगरूप परिणामों से) ऊजडे को [वसितान्] (स्व-संवेदन ज्ञान द्वारा) बसाता है, [यः] जो [वसितान्] बसे हुए (मिथ्यात्वादि परिणाम) से [शून्यान्] रहित होता है, [तस्य योगिनः] उस योगी की [अहं बलिं कुर्वे] मैं पूजा करता हूँ, [यस्य न पापं न पुण्यम्] जिसके न तो पाप है और न पुण्य है ।
Meaning : I highly respect that Yogin who populates the depopulated and depspulates the populated and who has got neither Punya (virtue) nor Papa (evil).

  श्रीब्रह्मदेव