
मोहु विलिज्जइ मणु मरइ तुट्टइ सासु-णिसासु ।
केवल-णाणु वि परिणमइ अंबरि जाहँ णिवासु ॥163॥
मोहो विलीयते मनो म्रियते त्रुटयति श्वासोच्छ्वासः ।
केवलज्ञानमपि परिणमति अम्बरे येषां निवासः ॥१६३॥
अन्वयार्थ : [येषां] जिन का [अंबरे निवासः] परमसमाधि में निवास है, उनका [मोहः विलीयते] मोह नाश को प्राप्त हो जाता है, [मनः म्रियते] मन मर जाता है, [श्वासोच्छ्वासः त्रुटयति] श्वासोच्छ्वास रुक जाता है, [अपि केवलज्ञानम् परिणमति] और केवलज्ञान उत्पन्न होता है ।
Meaning : When a man lives in his pure self , his Moha is extirpated, his mind is killed , and breath stopped . Such a one gets Kewala Jnana and goes unto Nirvana.
श्रीब्रह्मदेव