
इहु तणु जीवड तुज्झ रिउ दुक्खइँ जेण जणेइ ।
सो परु जाणहि मित्तु तुहुँ जो तणु एहु हणेइ ॥182॥
इयं तनुः जीव तव रिपुः दुःखानि येन जनयति ।
तं परं जानीहि मित्रं त्वं यः तनुमेतां हन्ति ॥१८२॥
अन्वयार्थ : [जीव] हे जीव ! [इयं तनुः] यह शरीर [तव रिपुः] तेरा शत्रु है, [येन] क्योंकि [दुःखानि] दुःखों को [जनयति] उत्पन्न करता है, [यः] जो [इमां तनुं] इस शरीर का [हंति] घात करे, [तं] उसको [त्वं] तुम [परं मित्रं] परम-मित्र [जानीहि] जानो ।
Meaning : O soul! This body is thy enemy, because it produces sufferings and pain. Therefore, if anybody destroys thy body, regard him as thy friend.
श्रीब्रह्मदेव