+ दुःख में भी सकारात्मकता -
उदयहँ आणिवि कम्मु मइँ जं भुंजेवउ होइ ।
तं सह आविउ खविउ मइँ सो पर लाहु जि कोइ ॥183॥
उदयमानीय कर्म मया यद् भोक्त व्यं भवति ।
तत् स्वयमागतं क्षपितं मया स परं लाभ एव कश्चित् ॥१८३॥
अन्वयार्थ : [यत् मया] जो मैं [कर्म उदयम् आनीय] कर्म को उदय में लाकर [भोक्तव्यं भवति] भोगना चाहता था, [तत्] वह कर्म [स्वयम् आगतं] आप ही आ गया, [मया क्षपितं] इससे मैं शांत चित्त से फल सहनकर क्षय करूँ, [स कश्चित्] यह कोई [परं लाभः] महान् ही लाभ हुआ ।
Meaning : Great Yogins by their spiritual force make their previously accumilated Karmas active, and destroy them. If these Karmas become ripened and are destroyed themselves, it is far better.

  श्रीब्रह्मदेव