+ परमात्मप्रकाश के अभ्यास का फल -
अण्णु वि भत्तिए जे मुणहिँ इहु परमप्प-पयासु ।
लोयालोय-पयासयरु पावहिँ ते वि पयासु ॥205॥
अन्यदपि भक्त्या ये मन्यन्ते इमं परमात्मप्रकाशम् ।
लोकालोकप्रकाशकरं प्राप्नुवन्ति तेऽपि प्रकाशम् ॥२०५॥
अन्वयार्थ : [अन्यदपि] और भी कहते हैं, [ये भक्त्या] जो भक्ति से [इमं परमात्मप्रकाशम्] इस परमात्मप्रकाश शास्त्र को [जानन्ति] पढ़ें, सुनें, इसका अर्थ जानें, [तेऽपि] वे भी [लोकालोकप्रकाशकरं] लोकालोक को प्रकाशनेवाले [प्रकाशम्] केवलज्ञान तथा उसके आधारभूत परमात्म-तत्त्व को शीघ्र ही पा सकेंगे ।

  श्रीब्रह्मदेव