+ परमात्मप्रकाश के पढ़ने का फल -
जे परमप्प-पयासयहं अणुदिणु णाउ लयंति ।
तुट्टइ मोहु तडत्ति तहँ तिहुयण-णाह हवंति ॥206॥
ये परमात्मप्रकाशस्य अनुदिनं नामं गृह्णन्ति ।
त्रुटयति मोहः झटिति तेषां त्रिभुवननाथा भवन्ति ॥२०६॥
अन्वयार्थ : [ये] जो [परमात्मप्रकाशकस्य] परमात्मा के प्रकाश करनेवाले इस ग्रंथ का [अनुदिनं] सदैव [नामं गृह्णन्ति] नाम लेते (स्मरण करते) हैं,
[तेषां] उनका [मोहः] मोह [झटिति त्रुटयति] शीघ्र ही टूट जाता है, और वे [त्रिभुवननाथा भवंति] तीन भुवनके नाथ होते हैं ।
Meaning : Those who daily think over the name of Parmatma Prakasha, destroy their Moha Karma soon and become the Nathas, masters of the three worlds.

  श्रीब्रह्मदेव