
णाण-वियक्खणु सुद्ध-मणु जो जणु एहउ कोइ ।
सो परमप्प-पयासयहँ जोग्गु भणंति जि जोइ ॥209॥
ज्ञानविचक्षणः शुद्धमना यो जन ईद्रशः कश्चिदपि ।
तं परमात्मप्रकाशकस्य योग्यं भणन्ति ये योगिनः ॥२०९॥
अन्वयार्थ : [यः जनः] जो प्राणी [ज्ञानविचक्षणः] स्वसंवेदन-ज्ञान द्वारा विचक्षण हैं, और [शुद्धमनाः] शुद्ध-मन हैं, [कश्चिदपि ईदृशः] ऐसा कोई भी सत्पुरुष हो, [तं] उसे [ये योगिनः] जो योगीश्वर हैं, वे [परमात्मप्रकाशकस्य योग्यं] परमात्मप्रकाश के योग्य [भणंते] कहते हैं ।
Meaning : He who possesses the Jnana of self and whose mind is pure,-such a one is competent to understand the Parmatma Prakasha.
श्रीब्रह्मदेव