+ उद्धतपने का त्याग -
इत्थु ण लेवउ पंडियहिँ गुण-दोसु वि पुणरुत्तु ।
भट्ट-पभायर-कारणइँ मइँ पुणु पुणु वि पउत्तु ॥211॥
अत्र न ग्राह्यः पण्डितैः गुणो दोषोऽपि पुनरुक्त : ।
भट्टप्रभाकरकारणेन मया पुनः पुनरपि प्रोक्तम् ॥२११॥
अन्वयार्थ : [यत्र] इस (ग्रंथ) में [पुनरुक्तः] पुनरुक्ति का [गुणो दोषोऽपि] गुण-दोष भी [पंडितैः न ग्राह्यः] पंडितजन ग्रहण नहीं करें, [मया] मैंने [भट्टप्रभाकरकारणेन] प्रभाकरभट्ट के संबोधनके लिए [पुनः पुनरपि प्रोक्तम्] कथन बार-बार किया है ।
Meaning : Pandits (learned men) should not find fault with the repetitions contained in this Grantha, because I have said many things over and over again in order to make Prabhakara Bhatta understand them.

  श्रीब्रह्मदेव