
अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्म संगविवर्जनम् ।
कषाय-विकले ज्ञाने समस्तं नैव तिष्ठति ॥36॥
अन्वयार्थ : ज्ञाने कषाय-विकले अहिंसा सत्यं अस्तेयं ब्रह्म संगविवर्जनं समस्तं नैव तिष्ठति ।
ज्ञान जब क्रोधादि कषाय परिणामों से विकल होने पर ; तब अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रहभाव समस्त ही भाव स्थिर नहीं रहते ।