+ आत्मरमणता से पापों का पलायन -
हिंसत्वं वितथं स्तेयं मैथुनं संगसंग्रह: ।
आत्मरूपगते ज्ञाने नि:शेषं प्रपलायते ॥37॥
अन्वयार्थ : ज्ञाने आत्मरूपगते हिंसत्वं वितथं स्तेयं मैथुनं संगसंग्रह: नि:शेषं प्रपलायते ।
ज्ञान के आत्मरूप में परिणत होने पर (आत्मा के आत्मस्वरूप में लीन होने पर) हिंसा, झूठ, चोरी, अब्रह्म और परिग्रह - ये पाँचों पाप भाग जाते हैं (कोई भी पाप नहीं रहता)