+ संसारी जीवों की लोकाकाश में व्यापकता - -
लोकासंख्येयभागादाववस्थानं शरीरिणाम् ।
अंशा विसर्प-संहारौ दीपानामिव कुर्वते ॥73॥
अन्वयार्थ : शरीरिणां अवस्थानं लोक-असंख्येयभागादौ (भवति)(संसारी जीवानां) अंशा: दीपानां इव विसर्प-संहारौ कुर्वते ।
शरीरधारी संसारीजीव की व्यापकता लोकाकाश के असंख्येय भागादिकों में (लोकाकाश के असंख्यातवें भाग में) होती है । संसारी जीवों के प्रदेश शरीर के आकारानुसार दीपकों के प्रकाश के समान संकोच-विस्तार करते रहते हैं ।