+ पुद्गलों से लोक भरा है - -
सूक्ष्मै: सूक्ष्मतरैर्लोक: स्थूलै: स्थूलतरैश्चित: ।
अनन्तै: पुद्गलैश्चित्रै: कुम्भो धूमैरिवाभित: ॥79॥
अन्वयार्थ : धूमै: कुम्भः इव लोकः अभित: सूक्ष्मै: सूक्ष्मतरै: स्थूलै: स्थूलतरै: अनन्तै: चित्रै: पुद्गलै: चित: (अस्ति)
धूम से ठसाठस भरे हुए घट के समान लोकाकाश सर्व ओर से अनेक प्रकार के सूक्ष्म-सूक्ष्मतर, स्थूल-स्थूलतर अनन्त पुद्गलों से ठसाठस भरा हुआ है ।