
योगेन ये समायान्ति शस्ताशस्तेन पुद्गला: ।
तेऽष्टकर्मत्वमिच्छन्ति कषाय-परिणामत: ॥82॥
अन्वयार्थ : शस्त-अशस्तेन योगेन ये पुद्गला: समायान्ति, ते कषाय-परिणामत: अष्ट-कर्मत्वं इच्छन्ति ।
मन-वचन-काय के शुभ अथवा अशुभ योग के निमित्त से जो पुद्गल आत्म-प्रदेशों में प्रवेश करते हैं, वे ही पुद्गल कषाय परिणामों के निमित्त से ज्ञानावरणादि अष्टकर्मरूप परिणमती हैं ।