+ कर्मों की विभिन्नता पुद्गलकृत हैं - -
विविधा: पुद्गला: स्कन्धा: संपद्यन्ते यथा स्वयम् ।
कर्मणामपि निष्पत्तिरपरैरकृता तथा ॥85॥
अन्वयार्थ : यथा विविधा: पुद्गला: स्वयं स्कन्धा: संपद्यन्ते तथा (एव) कर्मणां अपि निष्पत्ति: अपरै: अकृता (भवति)
जिसप्रकार पुद्गल स्वयं अनेक प्रकार के स्कन्धरूप बन जाते हैं, उसीप्रकार अनेक प्रकार के कर्मों की निष्पत्ति भी दूसरों के द्वारा किये बिना ही (स्वतः ही) होती है ।