
कर्मभावं प्रपद्यन्ते न कदाचन चेतना: ।
कर्म चैतन्यभावं वा स्वस्वभावव्यवस्थिते: ॥86॥
अन्वयार्थ : स्व-स्वभाव-व्यवस्थिते: चेतना: कदाचन कर्मभावं न प्रपद्यन्ते वा कर्म चैतन्यभावं ।
अपने-अपने स्वभाव में सदा व्यवस्थित/स्थिर/एकरूप रहने के कारण जीव कभी भी कर्मपने को प्राप्त नहीं होते । अपने-अपने स्वभाव में सदा व्यवस्थित रहने के कारण कर्म कभी भी जीवपने को प्राप्त नहीं होते ।