
यद्युपादानभावेन विधत्ते कर्म चेतनम् ।
अचेतनत्वमेतस्य तदा केन निषिध्यते ॥88॥
अन्वयार्थ : यदि कर्म उपादान-भावेन चेतनं विधत्ते तदा एतस्य अचेतनत्वं केन निषिध्यते ?
यदि कर्म अपने उपादानभाव से चेतन का निर्माण करता है तो इस चेतनरूप जीव के अचेतनपने के प्रसंग का निषेध कैसे किया जा सकता है ?