
सचित्ताचित्तयोर्यावद्द्रव्ययो: परयोरयम् ।
आत्मीयत्व-मतिं धत्ते तावन्मोहो विवर्धते ॥112॥
अन्वयार्थ : यावत् अयं सचित्त-अचित्तयो: परयो: द्रव्ययो: आत्मीयत्व-मतिं धत्ते तावत् मोह: विवर्धते ।
जब तक यह जीव चेतन-अचेतनरूप पर-पदार्थों में निजत्वबुद्धि/अपनेपन की बुद्धि रखता है , तब तक इस जीव का मोह बढ़ता रहता है ।