
तेषु प्रवर्तमानस्य कर्मणामास्रव: पर: ।
कर्मास्रव-निमग्नस्य नोत्तारो जायते तत: ॥113॥
अन्वयार्थ : तेषु प्रवर्तमानस्य कर्मणाम् पर: आस्रव: । तत: कर्मास्रव-निमग्नस्य उत्तार: न जायते ।
चेतन-अचेतनरूप पर-पदार्थों में अपनेपन की बुद्धि से प्रवृत्ति को प्राप्त जीव को कर्मों का महा आस्रव होता है । इसलिए जो कर्मों के महा आस्रवों में डूबा रहता है, उस जीव का संसार से उद्धार नहीं हो सकता ।