+ मिथ्यात्व-रक्षक परिणाम - -
मयीदं कार्मणं द्रव्यं कारणेऽत्र भवाम्यहम् ।
यावदेषा मतिस्तावन्मिथ्यात्वं न निवर्तते ॥114॥
अन्वयार्थ : इदं कार्मणं द्रव्यं मयि (अस्ति) । अत्र कारणे अहं (निमित्त:) भवामि । (इत्थं) यावत् (जीवस्य) एषा मति: (भवति) तावत् मिथ्यात्वं न निवर्तते ।
कर्मजनित ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म, मोह-राग-द्वेषादि भावकर्म और शरीरादि नोकर्मरूप पदार्थसमूह मुझ में है, इन द्रव्यकर्मादिक का कारण मैं हूँ; यह बुद्धि जबतक जीव की बनी रहती है, तबतक मिथ्यात्व नहीं छूटता ।