
उत्पद्यन्ते यथा भावा: पुद्गलापेक्षयात्मन: ।
तथैवौदयिका भावा विद्यन्ते तदपेक्षया ॥135॥
अन्वयार्थ : यथा पुद्गलापेक्षया आत्मन: भावा: उत्पद्यन्ते तथा एव तदपेक्षया औदयिका: भावा: विद्यन्ते ।
जिसप्रकार पुद्गलात्मक कर्म के उदयादि की अपेक्षा जीव के औदयिकादि भाव उत्पन्न होते हैं; उसीप्रकार पुद्गलरूप कर्म की अपेक्षा से उत्पन्न औदयिक भाव विद्यमान रहते हैं ।