
स्वकीय-गुण-कर्तृत्वं तत्त्वतो जीव-कर्मणो: ।
क्रियते हि गुणस्ताभ्यां व्यवहारेण गद्यते ॥134॥
अन्वयार्थ : तत्त्वत: जीव-कर्मणो: स्वकीय-गुण-कर्तृत्वं ; ताभ्यां गुण: क्रियते हि व्यवहारेण गद्यते ।
निश्चयनय से जीव और कर्म में अपने-अपने गुणों का कर्तापना विद्यमान है ; एक के द्वारा दूसरे के गुणों / पर्यायों का किया जाना जो कहा जाता है, वह सर्व व्यवहारनय की अपेक्षा से कहा जाता है ।