
पापारम्भं परित्यज्य शस्तं वृत्तं चरन्नपि ।
वर्तमान: कषायेन कल्मषेभ्यो न मुच्यते ॥147॥
अन्वयार्थ : पापारम्भं परित्यज्य शस्तं वृत्तं चरन् अपि कषायेन वर्तमान: कल्मषेभ्य: न मुच्यते ।
हिंसादि पाँच पाप और पापजनक आरम्भ को छोड़कर पुण्यमय आचरण करता हुआ भी यदि कषाय के साथ वर्त रहा है तो वह पाप से नहीं छूटता ।