
य: पुण्यपापर्योमूढ़ोऽविशेषं नावबुध्यते ।
स चारित्रपरिभ्रष्ट: संसार-परिवर्धक: ॥146॥
अन्वयार्थ : य: मूढ: पुण्य-पापयो: विशेषं न अवबुध्यते; स: चारित्रभ्रष्ट:; संसारपरिवर्धक: ।
जो मूढ पुण्य-पाप में अविशेष नहीं जानता है , वह चारित्र से भ्रष्ट और संसार को बढ़ानेवाला है ।