
मिथ्याज्ञान-निविष्ट-योग-जनिता: संकल्पना भूरिश: ।
संसार-भ्रमकारिकर्म-समितेरावर्जने या क्षमा: ॥
त्यज्यन्ते स्व-परान्तरं गतवता नि:शेषतो येन तास्तेनात्मा ।
विगताष्टकर्म-विकृति: संप्राप्यते तत्त्वत: ॥149॥
अन्वयार्थ : मिथ्याज्ञान-निविष्ट-योग-जनिता: भूरिश: संकल्पना: संसार-भ्रमणकारि-कर्म-समिते: आवर्जने या: क्षमा: ता: स्व-परान्तरं गतवता येन नि:शेषत: त्यज्यन्ते तेन तत्त्वत: विगत-अष्ट-कर्म-विकृति: आत्मा संप्राप्यते ।
मिथ्याज्ञान पर आधारित योगों से उत्पन्न हुई जो बहुत-सी कल्पनाएँ संसार-भ्रमण करानेवाले कर्मसमूह के आस्रव में समर्थ हैं; वे स्व-पर के भेद को पूर्णतः जाननेवाले जिस योगी के द्वारा पूरी तरह त्यागी जाती हैं; उसके द्वारा वस्तुतः आठों कर्मों की विकृति से रहित शुद्ध आत्मा प्राप्त किया जाता है - कर्मों के सारे विकार से रहित विविक्त आत्मा की उपलब्धि उसी योगी को होती है, जो उक्त योगजनित कल्पनाओं एवं कर्मास्रव-मूलक वृत्तियों का पूर्णतः त्याग करता है ।