
पुद्गलानां यदादानं योग्यानां सकषायत: ।
योगत: स मतो बन्धो जीवास्वातन्त्र्य-कारणम् ॥150॥
अन्वयार्थ : योग्यानां पुद्गलानां सकषायत: योगत: यत् आदानं स: बन्ध: मत: जीव-अस्वातन्त्र्य-कारणं ।
कर्मरूप परिणमनेयोग्य कार्माणवर्गणारूप पुद्गलों का कषाय सहित योग से जीव, द्वारा जो ग्रहण होता है, उसको बन्ध कहते हैं, जो जीव की पराधीनता का कारण है ।