
कर्मणा निर्मितं सर्वं मरणादिकमात्मन: ।
कर्मावितरतान्येन कर्तुं हर्तुं न शक्यते ॥160॥
अन्वयार्थ : आत्मन: मरणादिकं सर्वं कर्मणा निर्मितं । कर्म-अवितरत-अन्येन कर्तंु हर्तुं न शक्यते ।
आत्मा का मरण-जीवन, सुख-दुःख, रक्षण, पीड़न - ये सब कार्य कर्म द्वारा निर्मित हैं । जो कर्म को नहीं देनेवाले ऐसे अन्यजन हैं, उनके द्वारा जीवन-मरणादिक का करना-हरना कभी नहीं बन सकता ।