+ जिलाने आदि की मान्यता मिथ्यात्वजनित - -
या जीवयामि जीव्येऽहं मार्येऽहं मारयाम्यहम् ।
निपीडये निपीड्येऽहं सा बुद्धिर्मोहकल्पिता ॥161॥
अन्वयार्थ : (अहं) जीवयामि, अहं जीव्ये, अहं मारयामि, अहं मार्ये, (अहं) निपीडये, निपीड्ये या बुद्धि: सा मोह-कल्पिता (भवति)
मैं दूसरे जीवों को जिलाता हूँ, मुझे दूसरे जीव जिलाते हैं, मैं दूसरे जीवों को मारता हूँ, मुझे दूसरे जीव मारते हैं, मैं दूसरे जीवों को पीड़ा देता हूँ, मुझे दूसरे जीव पीडा देते हैं - इसतरह की जो मान्यता है, वह मिथ्यात्व से निर्मित अर्थात् मोह से की हुई कल्पना ही है ।