
आहारादिभिरन्येन कारिर्तैोदितै: कृतै: ।
तदर्थं बध्यते योगी नीरागो न कदाचन ॥169॥
अन्वयार्थ : नीराग: योगी तदर्थं अन्येन कृतै: कारितै: मोदितै: आहारादिभि: कदाचन न बध्यते ।
अनंतानुबंधी आदि तीन कषाय चौकडी के अभावपूर्वक व्यक्त वीतरागता सहित योगी के लिए दूसरों से किये, कराये तथा अनुमोदित आहार, वसतिका आदि से मुनिराज कभी भी बंध को प्राप्त नहीं होते ।