
परद्रव्यगतै-र्दोषैर्नीरागो यदि बध्यते ।
तदानीं जायते शुद्धि: कस्य कुत्र कुत: कदा ॥170॥
अन्वयार्थ : परद्रव्यगतै: दोषै: यदि नीराग: बध्यते; तदानीं कस्य कदा कुत्र कुत: शुद्घि: जायते ?
परद्रव्य में उत्पन्न होनेवाले दोषों के कारण यदि वीतरागी मुनिराज को कर्म का बंध होता रहे तो फिर किसकी, कब, कहाँ और कैसे शुद्धि हो सकती है ?