
यथावस्तुपरिज्ञानं ज्ञानं ज्ञानिभिरुच्यते ।
राग-द्वेष-मद-क्रोधै: सहितं वेदनं पुन: ॥173॥
अन्वयार्थ : यथा - वस्तु परिज्ञानं ज्ञानिभि: ज्ञानं उच्यते पुन: रागद्वेष-मद-क्रोधै: सहितं वेदनं ।
जो वस्तु जिस रूप में स्थित है, उसे उसी रूप में जानने को ज्ञानीजनों ने ज्ञान कहा है और जो जानना राग-द्वेष, मद, क्रोध सहित होता है, उसे वेदन कहते हैं ।