
कर्म गृह्णाति संसारी कषाय-परिणामत: ।
सुगतिं दुर्गतिं याति जीव: कर्म-विपाकत: ॥177॥
अन्वयार्थ : संसारी जीव: कषाय-परिणामत: कर्म गृह्णाति, कर्म-विपाकत: सुगतिं दुर्गतिं याति ।
संसारी-जीव कषायादि मोह परिणाम से कर्म को ग्रहण करता है अर्थात् कर्म को बाँधता है और पूर्व बद्ध कर्म के अनुभागोदय से सुगति तथा दुर्गति को प्राप्त होता है ।